12/31/10

नए साल क़ी शुभकामनाएं- सर्वेश्वर


खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को,
कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को,
नए साल की शुभकामनाएं.

जांतें के गीतों को, बैलों की चाल को,
करघे को, कोल्हू को, मछुओं के जाल को,
नए साल की शुभकामनाएं.


इक पकती रोटी को, बच्चों के शोर को,
चौके की गुनगुन को, चूल्हे की भोर को,
नए साल की शुभकामनाएं.

वीराने जंगल को, तारों को, रात को,
ठंढी दो बंदूकों में घर की बात को,
 नए साल की शुभकामनाएं.


इस चलती आंधी में, हर बिखरे बाल को,
सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़्वाब को,
हर नन्हीं याद को, हर छोटी भूल को,
नए साल की शुभकामनाएं.



कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को,
उनको, जिन्होंने चुन-चुन कर ग्रीटिंग कार्ड लिखे,
उनको, जो अपने गमलों में चुपचाप दिखे,
नए साल की शुभकामनाएं.
...सर्वेश्वर

12/28/10

लोकतंत्र को उम्रकैद- प्रणय कृष्ण

'देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की'
(बिनायक सेन की गिरफ्तारी के पीछे की हकीकतें और सबक )

'नई आज़ादी के योद्धा' बिनायक सेन की गिरफ्तारी के पीछे की राजनीति और संकट की जरूरी पड़ताल करता, जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण का यह लेख मुझे मिला. पढ़िए, और आईये, बिनायक जी के साथ हर संभव तरीके से मजबूती से खड़े हों.

25 दिसम्बर, २०१०

ये मातम की भी घडी है और इंसाफ की एक बडी लडाई छेडने की भी. मातम इस देश में बचे-खुचे लोकतंत्र का गला घोंटने पर और लडाई- न पाए गए इंसाफ के लिए जो यहां के हर नागरिक का अधिकार है. छत्तीसगढ की निचली अदालत ने विख्यात मानवाधिकारवादी, जन-चिकित्सक और एक खूबसूरत इंसान डा. बिनायक सेन को भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी और धारा 124-ए, छत्तीसगढ विशेष जन सुरक्षा कानून की धारा 8(1),(2),(3) और (5) तथा गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून की धारा 39(2) के तहत राजद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेडने की साज़िश करने के आरोप में 24 दिसम्बर के दिन उम्रकैद की सज़ा सुना दी.

यहां कहने का अवकाश नहीं कि कैसे ये सारे कानून ही कानून की बुनियाद के खिलाफ हैं. डा. सेन को इन आरोपों में 24 मई, 2007 को गिरफ्तार किया गया और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से पूरे दो साल साधारण कैदियों से भी कुछ मामलों में बदतर स्थितिओं में जेल में रहने के बाद, उन्हें ज़मानत दी गई. मुकादमा उनपर सितम्बर 2008 से चलना शुरु हुआ. सर्वोच्च न्यायालय ने यदि उन्हें ज़मानत देते हुए यह न कहा होता कि इस मुकदमे का निपटारा जनवरी 2011 तक कर दिया जाए, तो छत्तीसगढ सरकार की योजना थी कि मुकदमा दसियों साल चलता रहे और जेल में ही बिनायक सेन बगैर किसी सज़ा के दसियों साल काट दें. बहरहाल जब यह सज़िश नाकाम हुई और मजबूरन मुकदमें की जल्दी-जल्दी सुनवाई में सरकार को पेश होना पडा, तो उसने पूरा दम लगाकर उनके खिलाफ फर्ज़ी साक्ष्य जुटाने शुरु किए.

डा. बिनायक पर आरोप था कि वे माओंवादी नेता नारायण सान्याल से जेल में 33 बार 26 मई से 30 जून, 2007 के बीच मिले. सुनवाई के दौरान साफ हुआ कि नारायण सान्याल के इलाज के सिलसिले में ये मुलाकातें जेल अधिकारियों की अनुमति से, जेलर की उपस्थिति में हुईं. डा. सेन पर मुख्य आरोप यह था कि उन्होंने नारायण सान्याल से चिट्ठियां लेकर उनके माओंवादी साथियों तक उन्हें पहुंचाने में मदद की. पुलिस ने कहा कि ये चिट्ठियां उसे पीयुष गुहा नामक एक कलकत्ता के व्यापारी से मिलीं जिसतक उसे डा. सेन ने पहुंचाया था. गुहा को पुलिस ने 6 मई,2007 को रायपुर में गिरफ्तार किया. गुहा ने अदालत में बताया कि वह 1 मई को गिरफ्तार हुए. बहरहाल ये पत्र कथित रूप से गुहा से ही मिले, इसकी तस्दीक महज एक आदमी अ़निल सिंह ने की जो कि एक कपडा व्यापारी है और पुलिस के गवाह के बतौर उसने कहा कि गुहा की गिरफ्तरी के समय वह मौजूद था. इन चिट्ठियों पर न कोई नाम है, न तारीख, न हस्ताक्षर, न ही इनमें लिखी किसी बात से डा. सेन से इनके सम्बंधों पर कोई प्रकाश पडता है. पुलिस आजतक भी गुहा और डा़. सेन के बीच किसी पत्र-व्यवहार, किसी फ़ोन-काल,किसी मुलाकात का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाई. एक के बाद एक पुलिस के गवाह जिरह के दौरान टूटते गए.

पुलिस ने डा.सेन के घर से मार्क्सवादी साहित्य और तमाम कम्यूनिस्ट पार्टियों के दस्तावेज़, मानवाधिकार रिपोर्टें, सी.डी़ तथा उनके कम्प्यूटर से तमाम फाइलें बरामद कीं. इनमें से कोई चीज़ ऐसी न थी जो किसी भी सामान्य पढे लिखे, जागरूक आदमी को प्राप्त नहीं हो सकतीं. घबराहट में पुलिस ने भाकपा (माओंवादी) की केंद्रीय कमेटी का एक पत्र पेश किया जो उसके अनुसार डा. सेन के घर से मिला था. मज़े की बात है कि इस पत्र पर भी भेजने वाले के दस्तखत नहीं हैं. दूसरे, पुलिस ने इस पत्र का ज़िक्र उनके घर से प्राप्त वस्तुओं की लिस्ट में न तो चार्जशीट में किया था, न ”सर्च मेमों” में. घर से प्राप्त हर चीज़ पर पुलिस द्वारा डा. बिनायक के हस्ताक्षर लिए गए थे. लेकिन इस पत्र पर उनके दस्तखत भी नहीं हैं. ज़ाहिर है कि यह पत्र फर्ज़ी है. साक्ष्य के अभाव में पुलिस की बौखलाहट तब और हास्यास्पद हो उठी जब उसने पिछली 19 तारीख को डा.सेन की पत्नी इलिना सेन द्वारा वाल्टर फर्नांडीज़, पूर्व निदेशक, इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट ( आई.एस. आई.),को लिखे एक ई-मेल को पकिस्तानी आई.एस. आई. से जोडकर खुद को हंसी का पात्र बनाया. मुनव्वर राना का शेर याद आता है-

“बस इतनी बात पर उसने हमें बलवाई लिक्खा है
हमारे घर के बरतन पे आई.एस.आई लिक्खा है”

इस ई-मेल में लिखे एक जुमले ”चिम्पांज़ी इन द व्हाइट हाउस” की पुलिसिया व्याख्या में उसे कोडवर्ड बताया गया.(आखिर मेरे सहित तमाम लोग इतने दिनॉं से मानते ही रहे हैं कि ओंबामा से पहले वाइट हाउस में एक बडा चिंम्पांज़ी ही रहा करता था.) पुलिस की दयनीयता इस बात से भी ज़ाहिर है कि डा.सेन के घर से मिले एक दस्तावेज़ के आधार पर उन्हें शहरों में माओंवादी नेटवर्क फैलाने वाला बताया गया. यह दस्तावेज़ सर्वसुलभ है. यह दस्तावेज़ सुदीप चक्रवर्ती की पुस्तक, ”रेड सन- ट्रैवेल्स इन नक्सलाइट कंट्री” में परिशिष्ट के रूप में मौजूद है. कोई भी चाहे इसे देख सकता है. कुल मिलाकर अदालत में और बाहर भी पुलिस के एक एक झूठ का पर्दाफाश होता गया. लेकिन नतीजा क्या हुआ? अदालत में नतीजा वही हुआ जो आजकल आम बात है. भोपाल गैस कांड् पर अदालती फैसले को याद कीजिए. याद कीजिए अयोध्या पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को. क्या कारण हे कि बहुतेरे लोगों को तब बिलकुल आश्चर्य नहीं होता जब इस देश के सारे भ्रश्टाचारी, गुंडे, बदमाश और बलात्कारी टी.वी. पर यह कहते पाए जाते हैं कि वे न्यायपालिका का बहुत सम्मान करते हैं?

याद ये भी करना चाहिए कि भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह की धाराएं कब की हैं. राजद्रोह की धारा 124 -ए जिसमें डा. सेन को दोषी करार दिया गया है, 1870 में लाई गई. जिसके तहत सरकार के खिलाफ "घृणा फैलाना", "अवमानना करना" और "असंतोष पैदा" करना राजद्रोह है. क्या ऐसी सरकारें घृणित नहीं है जिनके अधीन 80 फीसदी हिंदुस्तानी 20 रुपए रोज़ पर गुज़ारा करते हैं? क्या ऐसी सरकारें अवमानना के काबिल नहीं जिनके मंत्रिमंडल राडिया, टाटा, अम्बानी, वीर संघवी, बरखा दत्त और प्रभु चावला की बातचीत से निर्धारित होते हैं? क्या ऐसी सरकारों के प्रति हम और आप असंतोष नहीं रखते जो आदिवसियों के खिलाफ "सलवा जुडूम" चलाती हैं, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और अमरीका के हाथ इस देश की सम्पदा को दुहे जाने का रास्ता प्रशस्त करती हैं. अगर यही राजद्रोह की परिभाषा है जिसे गोरे अंग्रेजों ने बनाया था और काले अंग्रेजों ने कायम रखा, तो हममे से कम ही ऐसे बचेंगे जो राजद्रोही न हों. याद रहे कि इसी धारा के तहत अंग्रेजों ने लम्बे समय तक बाल गंगाधर तिलक को कैद रखा.

डा. बिनायक और उनकी शरीके-हयात इलीना सेन देश के उच्चतम शिक्षा संस्थानॉं से पढकर आज के छत्तीसगढ में आदिवसियों के जीवन में रच बस गए. बिनायक ने पी.यू.सी.एल के सचिव के बतौर छत्तीसगढ सरकार को फर्ज़ी मुठभेड़ों पर बेनकाब किया, सलवा-जुडूम की ज़्यादतियों पर घेरा, उन्होंने सवाल उठाया कि जो इलाके नक्सल प्रभावित नहीं हैं, वहां क्यों इतनी गरीबी,बेकारी, कुपोषण और भुखमरी है? एक बच्चों के डाक्टर को इससे बडी तक्लीफ क्या हो सकती है कि वह अपने सामने नौनिहालों को तडपकर मरते देखे?

इस तक्लीफकुन बात के बीच एक रोचक बात यह है कि साक्ष्य न मिलने की हताशा में पुलिस ने डा. सेन के घर से कथित रूप से बरामद माओंवादियों की चिट्ठी में उन्हें ”कामरेड” संबोधित किए जाने पर कहा कि "कामरेड उसी को कहा जाता है, जो माओंवादी होता है". तो आप में से जो भी कामरेड संबोधित किए जाते हों (हों भले ही न), सावधान रहिए. कभी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कबीर के सौ पदों का अनुवाद किया था. कबीर की पंक्ति थी, ”निसि दिन खेलत रही सखियन संग”. गुरुदेव ने अनुवाद किया, ”Day and night, I played with my comrades' मुझे इंतज़ार है कि कामरेड शब्द के इस्तेमाल के लिए गुरुदेव या कबीर पर कब मुकदमा चलाया जाएगा?

अकारण नहीं है कि जिस छत्तीसगढ में कामरेड शंकर गुहा नियोगी के हत्यारे कानून के दायरे से महफूज़ रहे, उसी छत्तीसगढ में नियोगी के ही एक देशभक्त, मानवतावादी, प्यारे और निर्दोष चिकित्सक शिष्य को उम्र कैद दी गई है. 1948 में शंकर शैलेंद्र ने लिखा था-

“भगतसिंह ! इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की !

यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे--
बंब संब की छोड़ो, भाषण दिया कि पकड़े जाओगे !
निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,
कांग्रेस का हुक्म; जरूरत क्या वारंट तलाशी की ! “

ऊपर की पंक्तियों में ब़स कांग्रेस के साथ भाजपा और जोड़ लीजिए.

आश्चर्य है कि साक्ष्य होने पर भी कश्मीर में शोंपिया बलात्कार और हत्याकांड के दोषी, निर्दोष नौजवानॉं को आतंकवादी बताकर मार देने के दोषी सैनिक अधिकारी खुले घूम रहे हैं और अदालत उनका कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वे ए.एफ.एस. पी.ए. नामक कानून से संरक्षित हैं, जबकि साक्ष्य न होने पर भी डा. बिनायक को उम्र कैद मिलती है.

मित्रों मैं यही चाहता हूं कि जहां जिस किस्म से हो, जितनी दूर तक हो, हम डा. बिनायक सेन जैसे मानवरत्न के लिए आवाज़ उठाएं ताकि इस देश में लोग उस दूसरी गुलामी से सचेत हों जिसके खिलाफ नई आज़ादी के एक योद्धा हैं डा. बिनायक सेन.

12/25/10

रंग ए बनारस

प्रकाश उदय भोजपुरी के जाने पहचाने कवि हैं. वे बनारस में रहते हैं. उनकी कविता में वह ख़ास पन है जो सिर्फ और सिर्फ बनारस में ही मौजूद होता है.
आज पढ़िए उनकी कविता- "दुःख कहले सुनल से घटल बाड़े". इस कविता में शिव एक सामान्य गृहस्थ की तरह आते हैं, ज्ञानवापी में अल्ला के बगल में रहते हुए वे भी ज़िंदगी की सामान्यताओं में परेशान हैं. और सबसे बड़ी समस्या है कलश के छेद से सर पर टपकता पानी.




आवत आटे सावन शुरू होई नहवावन
भोला जाड़े में असाढ़े से परल बाड़ें

एगो लांगा लेखा देह, रखें राखी में लपेट
लोग धो-धा के उघारे पे परल बाड़ें
भोला जाड़े में...

ओने बरखा के मारे, गंगा मारे धारे-धारे
जटा पावें ना संभारे, होत जाले जा किनारे
शिव शिव हो दोहाई, मुंह मारी सेवकाई
उहो देवे पे रिजाईने अड़ल बाड़ें
भोला जाड़े में...

बाटे बड़ी बड़ी फेर, बाकी सबका ले ढेर
हई कलसा के छेद, देखा टपकल फेर
गौरा धउरा हो दोहाई, अ त ढेर ना चोन्हाईं
अभी छोटका के धोवे के हगल बाटे
भोला जाड़े में...

बाडू बड़ी गिरिहिथीन, खाली लईके के जिकिर
बाड़ा बापे बड़ा नीक, खाली अपने फिकिर
बाडू पथरे के बेटी, बाटे ज़हरे नरेटी
बात बाते-घाटे बढ़ल, बढ़ल बाटे
भोला जाड़े में...

सुनी बगल के हल्ला, ज्ञानवापी में से अल्ला
पूछें भईल का ए भोला, महकउला जा मोहल्ला
एगो माइक बाटे माथे, एगो तोहनी के साथे
भांग बूटी गांजा फेरू का घटल बाटे
भोला जाड़े में...

दुनू जना के भेंटाइल, माने दुःख दोहराइल
इ नहाने अंकुआइल, उ अजाने अउंजाइल
इ सोमारे हलकान, उनके जुम्मा लेवे जान
दुःख कहले सुनल से घटल बाड़े
भोला जाड़े में...

...प्रकाश उदय

शब्दार्थ:
1- आषाढ़ = बारिश का पहला महीना
2- लांगा लेखा = छरहरी
3- चोन्हाईं = अदा दिखाना
4- नरेटी = गला
5- ज्ञानवापी = बनारस में शिव मंदिर से लगी हुई मस्जिद
6- अंकुवाईल = अंकुरित होना
7- अउंजाइल =  परेशान होना  

12/8/10

दाढी के बहाने मूर (मार्क्स) से गपशप - विद्रोही

मूर है मेरा सनम

मूर है सेहरा मेरा, और मूर है मेरा सनम,
और वाह रे दाढ़ी तेरी, और वाह रे तेरी कलम।
एक किताबत पसरकर है छा गई संसार पर,
अंटार्टिका, अर्जेंटिना और चीन की दीवार पर।
यूरोप का पूर्वी किनारा,
लाल फिर भी लाल है,
कीर जैसे एशिया का पश्चिमी सिर लाल है।

लाल है पोलैण्ड और बाल्टिक सागर लाल है,
लाल है बर्लिन और जर्मन, फ्रांस-पेरिस लाल है।
ठेठ, बिलकुल ठेठ देखो, चाइना भी लाल है,
लाल है तिब्बत-ल्हासा, काठमांडू लाल है।
हिंदुओं का हिंदू ये नेपाली हिंदू लाल है,
और लाल मुस्लिम दुनिया देखो, लीबिया भी लाल है।
लाल है कर्नल गदाफी, ये गुरिल्ला लाल है.

तो लाल झंडा चढ़ गया है,
मंदिरों पर मस्जिदों पर,
लाल हैं पंडे-पुरोहित, मुल्ला-टुल्ला लाल हैं।
लाल हैं प्रोटेस्टेंट, क्रिश्चियन और कैथोलिक लाल हैं,
लाल है कट्टर यहूदी और पारसी लाल हैं।
और आपके भी राष्ट्रध्वज का एक तिहाई लाल है!
ये भगतसिंह की जमीं हिंदोस्तां भी लाल है,
और उधर आस्ट्रेलिया के सब गड़रिये लाल हैं।
कहा तक वर्णन करूं भेड़ों की पूछें लाल हैं,
अफ्रीका के काले वनों के लकड़हारे लाल हैं।
लाल है नेल्सन मंडेला, सारे काले लाल हैं,
लाल है मिस्री पिरामिड, नील का जल लाल है।
लाल है काबुल का किशमिश, तुर्की छुहारा लाल है,
लाल है अरबी कबीले और सहारा लाल है।
खून से लथपथ ये रेगिस्तान का बच्चा लाल है,
लाल है बेरुत और लेबनान देखो लाल है।
आज का नैसेरवां यासर अराफात लाल है,
लाल हैं बंजारा कौमे बद्दू कबीले लाल हैं।
और जात का बदजात ये आभीर बच्चा लाल है!

लाल तो अमरीका का सारा पिछवाड़ा लाल है,
नाक के नीचे उसी के क्यूबा भी लाल है।
क्यूबा का लाल कास्त्रो, लालों का भी लाल है,
ये लाल अपनी मां का नहीं, दुनिया की मां का लाल है।
उसकी दाढ़ी का नजारा, शौक है संसार का,
ये भी औलाद है उसी मूर दाढ़ीजार का।
आगे, तो हां लोगों, बिना दाढ़ी बिना मूंछ,
और कर गये लड़के करिश्मा, दढ़ियलों से पूछ-पूछ।

करने को तो औरतों ने क्रांति कर डाला जहां में,
फिर भी पूछेंगे बेहूदे, कि बताओ कि कहां में?
मैं बताता हूं, नहीं चलकर दिखाता हूं, वहीं,
आप चाहोगे तो बाबूजी दिखा दूंगा यहीं।

पर छोड़िये जी!
उनकी बातें फिर कभी जब फिर मिलेंगे,
आज की तो बात दाढ़ी-मूंछ के ही सिलसिले में।
फेरहिस्त लम्बी है लोगों, मेरे दाढ़ीबाजों की,
हो ची मिन्ह चाचा की दाढ़ी, दाढ़ी-ए-नव्वाब थी,
सिर झुका दाढ़ी हिला दे, तो हिल उठे लेदुआन,
दाढ़ी हिलाकर हंस दिए तो हिल गया वाशिंगटन ,
गिर गया गश खा कनेडी, रो पड़ा सच में निक्सन।

बात दाढ़ी की चली तो याद लेनिन की है आई,
सोचता हूं लेनिन, लेनिन था कि वह दाढ़ी था भाई!
क्या गजब की दाढ़ी इस ब्लादीमिर इल्यीच की थी,
यही लौंडा आगे चलकर दोस्तों लेनिन हुआ,
क्या कट थी दाढ़ी,
रूस कट या फ्रेंच कट या अन्य कट,
पर गौर से देखोगे तो लगती है
इंटरनेषनल कट।

और स्टालिन की मूंछों को कहोगे कौन कट ?
जाट कट या लाट कट याकि थीं कज्जाक कट,
पर ताव दे दो तो लगें
पूरी तरह उजबेक कट।
माउरा नहर के वेग कट,
मध्य युग के नाइटों कट,
नटों के उस्ताद कट,
मार्शल कट, जनरल कट और सिपहसालार कट,
पूर्वी सरदार कट, क्षत्रिय कट, तलवार कट
मूंछ स्टालिन की थी अकबर महान सम्राट कट,
जिसके आगे सीजर की मूंछें लगेंगी गिरहकट।
मूंछ तो बाबूजी रख लेते,
डाकू और चोरकट,
पर नाम जोसेफ का नहीं यूं ही स्टालिन पड़ा था,
उसकी मूंछें उस वक्त दुनिया का अमन-ओ-चैन थीं,
युद्ध के उपरांत उपजे
राष्ट्रसंघ कट थी।

इंसान की पहचान आदत से है, फैशन से नहीं,
क्या कहोगे भगत सिंह के हैट का क्या कट था ?
सिख कट या हिंदू कट याकि था अंग्रेज कट?
बराबरी का ताज था, बिरादरी का तख्त था,
समाजवाद का निशान, हैट क्रांति कट था।

कामरेड कट था-

दोस्ती का हाथ, दोस्त इंकलाब के लिए,
गया, गया चला गया,
तभी तो याद आ रही,
तभी सदा सता रही
भगत सिंह, भगतसिंह, कामरेड!
तुम्हारी मातृभूमि आर्तनाद कर रही है अर्द्धरात्रि में,
भगत सिंह, भगत सिंह, कामरेड!
तुम्हारी मातृभूमि रो रही
भूख-प्यास, दुख-शोक से,
कि वीरवर! उसे तुम्हारे खून की पुकार है,
उसे तुम्हारे बस उसी विचार की पुकार है,
जो विचार तेरा भी है मेरा भी है,
फिदेल, चे ग्वेरा का है,
जो विचार मूर का, मजूर का है,
हमें हमारे देश को वही विचार चाहिए,
हमें हमारे देश को वही किताब चाहिए।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को अवश्य।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को अटल।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को सहज।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब को सरल।
कि जिस किताब में लिखा है,
इंकलाब साध्य है।
कि जो किताब इंकलाब का ही इंतखाब है।
हमें हमारे देश को वही किताब चाहिए,
हमें हमारे देश को इंकलाब चाहिए।

क्योंकि इंकलाब से भला,
क्योंकि इंकलाब से बड़ा,
कुछ नहीं है
कुछ नहीं है
कुछ नहीं है
जहान में।

...रमाशंकर यादव 'विद्रोही'

12/1/10

कानून - गोरख पाण्डेय

अरुंधति रॉय के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की घटना ने एक हिन्दुस्तानी के बतौर हमारा सिर शर्म से झुका दिया है. सरकार की परिभाषाओ के हिसाब से आज तीन चौथाई से ज्यादा देश राजद्रोह का अपराधी ठहरेगा. नैतिक उच्चासन पर बैठ कर पूरे देश को देशभक्ति का प्रमाणपत्र देने वाले मीडिया के भीतर की सडान्ध का बहुत थोडा हिस्सा सामने आया है. जजों का भ्रष्टाचार अब पुरानी बात हो चुकी है.
कवि गोरख पाण्डेय की कविता 'कानून'1980 में लिखी गयी थी, भारतीय राष्ट्र के दमनकारी रुख को साफ़ बेनकाब करती है.

कानून

लोहे के पैरों में भारी बूट
कन्धो से लटकती बन्दूक
कानून अपना रास्ता पकड़ेगा
हथकड़ियाँ डालकर हाथों में
तमाम ताकत से उन्हें
जेलों की ओर खींचता हुआ
गुजरेगा विचार और श्रम के बीच से
श्रम से फल को अलग करता
रखता हुआ चीजों को
पहले से तय की हुई
जगहों पर
मसलन अपराधी को
न्यायधीश की, ग़लत को सही की
और पूँजी के दलाल को
शासक की जगह पर
रखता हुआ
चलेगा
मजदूरों पर गोली की रफ्तार से
भुखमरी की रफ्तार से किसानों पर
विरोध की जुबान पर
चाकू की तरह चलेगा
व्याख्या नहीं देगा
बहते हुए ख़ून की
कानून व्याख्या से परे कहा जायेगा
देखते-देखते
वह हमारी निगाहों और सपनों में
खौफ बनकर समा जायेगा
देश के नाम पर
जनता को गिरफ्तार करेगा
जनता के नाम पर
बेच देगा देश
सुरक्षा के नाम पर
असुरक्षित करेगा
अगर कभी वह आधी रात को
आपका दरवाजा खटखटायेगा
तो फिर समझिये कि आपका
पता नहीं चल पायेगा
खबरों से इसे मुठभेड़ कहा जायेगा


पैदा होकर मिल्कियत की कोख से
बहसा जायेगा
संसद में और कचहरियों में
झूठ की सुनहली पालिश से
चमकाकर
तब तक लोहे के पैरों
चलाया जायेगा कानून
जब तक तमाम ताकत से
तोड़ा नहीं जायेगा।

- गोरख पाण्डेय

11/28/10

शायरी मैंने ईजाद की - अफ़ज़ाल अहमद

 











शायरी मैंने ईजाद की

कागज़ मराकशियों ने ईजाद किया
हुरुफ फोनिशियों ने
शायरी मैंने ईजाद की

कब्र खोदने वाले ने तंदूर ईजाद किया
तंदूर पर कब्जा करने वालों ने रोटी की पर्ची बनाई
रोटी लेने वालों ने कतार ईजाद की
और मिलकर गाना सीखा

रोटी की कतार में जब चीटियाँ भी आ खड़ी हो गयीं
तो फ़ाका ईजाद हुआ

शहतूत बेचने वालों ने रेशम की कीड़ा ईजाद किया
शायरी ने रेशम से लड़कियों के लिबास बनाए
रेशम में मलबूस लड़कियों के लिए कुटनियों ने महलसरा ईजाद की
जहाँ जाकर उन्होंने रेशम के कीड़े का पता बता दिया

फासले ने घोड़े के चार पाँव ईजाद किये
तेज़ रफ्तारी ने रथ बनाया
और जब शिकस्त ईजाद हुई
तो मुझे तेज़ रफ़्तार रथ के आगे लिटा दिया गया

मगर उस वक्त तक शायरी ईजाद हो चुकी थी
मोहब्बत ने दिल ईजाद किया
दिल ने खेमा और कश्तियाँ बनाईं
और दूर-दराज़ मकामात तय किये

ख्वाजासरा ने मछली पकड़ने का काँटा ईजाद किया
और सोये हुए दिल में चुभो कर भाग गया

दिल में चुभे हुए कांटे की डोर थामने के लिए
नीलामी ईजाद की
और
ज़बर ने आख़िरी बोली ईजाद की

मैंने सारी शायरी बेचकर आग खरीदी
और ज़बर का हाथ जला दिया


...अफ़ज़ाल अहमद

11/27/10

की लाल? की लाल? (मैथिली) - नागार्जुन

आज मज़े के इस मूड में बाबा नागार्जुन याद आ गए! पढ़िए उनकी मैथिल कविता "की लाल! की लाल!".


की लाल? की लाल?

अढूलक फूल लाल !
आरतिक पात लाल !
तिलफ़ोड़क फSड लाल!
छऊडीक ठोर लाल !
सूगाक लोल लाल !
ई लाल! ओ लाल !

शोणित लाल, क्रान्ति लाल!
युद्धोत्तर शांति लाल !
रूसकेर देह लाल !
चीनकेर कोंढ़ लाल!
अमेरिकाक नाक लाल!
ब्रिटेनक जीह लाल !
ई! लाल! ओ लाल !

हम्मर मोसि लाल !
अहांक कलम लाल !
हिनकर पोथी लाल !
हुनक गत्ता लाल !
ककरो गाल लाल !
ककरो आंखि लाल !
ई लाल ! ओ लाल!

11/21/10

ख़ुदा, रामचंदर की यारी है ऐसी- विद्रोही

कबीर का तेवर देखना है तो आईये 'विद्रोही' के इलाके में. विद्रोही कविता जीते हैं, ओढ़ते-बिछाते हैं. कविता उनकी जिन्दगी है. बतियाते-गपियाते हुए विद्रोही ऐसा तीखा मज़ा लेते हैं कि धर्म-धुरंधरों के औसान खता हो जाते हैं. समाज के आख़िरी आदमी, खेत-मजदूर तक ये कविता बिना किसी विघ्न-बाधा, बिना किसी आलोचक सीधे पहुंचने की कूबत रखती है. कविता के नागर देश के बाशिंदों के लिए यह कविता थोड़ी नागवार गुजरेगी, पर इसके जिम्मेदार वे खुद ही हैं.
खैर, कविता ये रही. बोल कर पढेंगें, तो मज़ा बढ़ जायेगा, ऐसा मुझे लगा.

ख़ुदा, रामचंदर की यारी है ऐसी

पटाखा है ये और ये फुलझड़ी है,
ये दुनिया तुम्हारी ज़हर से भरी है.
यहां हर डगर पर कन्हैया खड़े हैं
कन्हैया खड़े हैं तो वंशी लिए हैं,
और काजल लगाए हैं, चंदन लिए हैं,
और नंगे हैं, पर पान खाए हुए हैं,
औ काजल लगाकर लजाए हुए हैं.

दुनिया की गाएं, इन्हीं की है गाएं,
कि दुनिया में चाहे जहां भी चराएं.
इधर देखिए रामचंदर खड़े हैं,
बगल में इन्हीं के लखन जी खड़े हैं,
बीच में उनके सीता माताजी खड़ी हैं.
ये सीताजी माताजी पूरी सती हैं,
ये पति के रहते भी बेपति हैं.

रोइये, रोइये! अब सभी रोइये!
राम, सीता, लखन, तीनो वन को चले हैं,
बे पैसे ही नारियों को तारते चले हैं,
मल्लाहों से पांव ये धुलाते चले हैं.
ये संतों-महंतों को देते चले हैं,
गरीबों, किसानों से लेते चले हैं.

प्रथम बाण से ये चमारों को मारें,
दूसरे बाण से ये गंवारों को मारें,
तीसरे बाण से जो बचा उसको मारें,
औरतों को तो अपने ही हाथों से मारें.

इधर देखिए ये ख़ुदा जी खड़े हैं,
ख़ुदा, रामचंदर से जैसे जुदा हैं,
ख़ुदा-रामचंदर में नुक्ते का अंतर,
ख़ुदा-रामचंदर हैं पूरे बराबर.
इधर रामचंद्र जी चंदन लिए हैं,
उधर से ख़ुदा जी भी टोपी लिए हैं.

कहां से नया बल ख़ुदा को हुआ है,
कब से हुए रामचंदर बहादुर?
ख़ुदा रामचंदर ये दोनों जने ही,
अमरीकी बुकनी की मालिश किए हैं,
ख़ुदा, रामचंदर ये दोनों हैं नंगे
पर पांवों में डालर की मालिश किए हैं.

...रमाशंकर यादव 'विद्रोही'

11/4/10

एक रुका हुआ फैसला

साफ़ रहे कि यह घटना 1992 में हुई थी
जब मारे गए थे शेख मोहम्मद गुलफाम
मरना ही पड़ा मिस्टर गुलफाम को
क़त्ल हो गया उनका सरेआम
सर, धड़ से अलहदा कर दिया गया
गली से नहीं संसद से आया था हत्यारा
क़ानून की मोटी मोटी किताबों से दबा कर
सांस नली पहले तोड़ दी गयी
फिर जुबान पर दीमक छोड़ दी गयी
पन्नों के तेज किनारों से हलाल कर दिए गए गुलफाम साहब
एहसान जाफरी के बड़े भाई गुलफाम जाफरी,
यह 30 सितम्बर की उमस भरी रात की बात नहीं है
यह बात है बहुत पुरानी
अब इस वक्त तो सिर्फ सबूत मिले हैं लाश के
खुदाई में!

मृत्युंजय

9/13/10

अकबर इलाहाबादी

अकबर इलाहाबादी की शायरी को मज़ाक और हल्केपन के साथ लिया जाता रहा है. इसका एक मुजाहिरा 'कविता कोश' ने तब किया जब उन्होंने अकबर के निम्नांकित शेर हास्य रस में डाले. मैं हास्य रस का विरोधी नहीं हूँ. पर अव्वल तो ये शेर सिर्फ हास्य के पैमाने से देखे नहीं जा सकते क्योंकि इनमें एक ख़ास व्यंग्य है.
दूसरे उस जमाने को याद करिए जब गांधी जी हिंद स्वराज लिख रहे थे. हिंद स्वराज में भी बहुतेरी 'पिछड़ी' बातें हैं, पर किसी की क्या मजाल की उस पर हंस सके! अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब हिंद स्वराज पर क्विंटलों सामग्री साया हुई है.
अंगरेजी उपनिवेशवाद से लड़ते झगड़ते अकबर कौम की बात करते हैं, जिसे पिछड़ा कहा जाता है. पर अंग्रेजों ने जो हमें दिया, वह सब बहुत अगड़ा है क्या? और खुद पूंजीवादी देशों में जो व्यवस्था राज कर रही है वह कितनी अगड़ी है, यह अबू गरेब और ग्वंतामालो के बाद आईने की तरह साफ़ ही है.
कहने का मतलब सिर्फ यह कि अकबर अपने हिसाब से अंगरेजी उपनिवेशवाद का विरोध कर रहे थे, जरूरी नहीं कि उनका 'पिछड़ापन' महत्त्व की रोशनी से जगमगा न रहा हो.
सो अकबर की शायरी पर वैसे ही सोचना होगा जैसे गांधी के हिंद स्वराज पर.

पेश हैं यहाँ उनके कुछ शेर
जो दिखाते सीधे हैं पर उपनिवेशवाद के हिन्दुस्तानी दलालों को काफी खराब लगते रहे होंगे-



तमाशा देखिये बिजली का मग़रिब और मशरिक़ में
कलों में है वहाँ दाख़िल, यहाँ मज़हब पे गिरती है

मग़रबी ज़ौक़ है और वज़ह की पाबन्दी भी
ऊँट पे चढ़ के थियेटर को चले हैं हज़रत

हम ऐसी कुल किताबें क़ाबिले-ज़ब्ती समझते हैं
कि जिनको पढ़ के बच्चे बापको ख़ब्ती समझते हैं

पाकर ख़िताब नाच का भी ज़ौक़ हो गया
‘सर’ हो गये, तो ‘बाल’ का भी शौक़ हो गया

ख़ुदा की राह में अब रेल चल गई ‘अकबर’!
जो जान देना हो अंजन से कट मरो इक दिन.

क्या ग़नीमत नहीं ये आज़ादी
साँस लेते हैं बात करते हैं!

मेरी नसीहतों को सुन कर वो शोख़ बोला-
"नेटिव की क्या सनद है साहब कहे तो मानूँ"


बेपर्दा नज़र आईं जो चन्द बीवियाँ
‘अकबर’ ज़मीं में ग़ैरते क़ौमी से गड़ गया
पूछा जो उनसे -‘आपका पर्दा कहाँ गया?’
कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों की पड़ गया.

फिरंगी से कहा, पेंशन भी ले कर बस यहाँ रहिये
कहा-जीने को आए हैं,यहाँ मरने नहीं आये

बर्क़ के लैम्प से आँखों को बचाए अल्लाह
रौशनी आती है, और नूर चला जाता है

क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ

9/5/10

कुमार गन्धर्व पर सर्वेश्वर

कुमार गन्धर्व एक अनूठे संगीतकार हैं. अपनी लोक सम्पृक्ति और आवेग भरी आवाज़ के साथ वे हमसे तादात्म्य कायम करते हैं. हिन्दी कवियों और रचनाकारों की एक पूरी पीढी उनसे गहरे प्रभावित रही है. पर सब ऐसा नहीं मानते. एक बार लगभग अनौपचारिक सी बातचीत में वरिष्ठ आलोचक शिव कुमार मिश्र ने सवाल खड़ा किया कि "कुमार साहब ने गाने के लिए कबीर के आध्यात्मिक पद ही चुने हैं. दूसरे किस्म के पद वहां नहीं हैं." और यह बात तथ्य के नहीं वरन आरोप की शक्ल में थी. हाँ, यह सच है, पर क्या गायन को हम सिर्फ उसके बोल के लिए सुनने जाते हैं? इसके लिए छपे हुए शब्द ही पढ़ लेना बेहतर होता. गायक गाने को कैसा निभाता है यह भी मानीखेज चीज है. गायन के रूप का कथ्य खोजने की बजाय इतने स्थूल रूप से उसके उपरी ढांचे को छू कर लौट आना मुझे विचित्र और आश्चर्यजनक, दोनों लगा. और जहाँ तक मोटा-मोटी ढांचे की भी बात है, कबीर को तो ऐसे पदों के लिए आध्यात्मिक नहीं कहा जाता. कुमार साहब पर यह इनायत क्यों? जवाब संभव हैं पर इसकी यहाँ जगह नहीं.

कुमार साहब की गायकी की ताकत को शब्दों में ढाल पाना बेहद मुश्किल काम है पर ये चुनौती निभाई सर्वेश्वर जी ने.इस अद्भुत कविता को हम सब तो पढ़ ही रहे हैं, शिवकुमार जी को जरूर ही इसे पढ़ना चाहिए!
आज वही कविता-

सुरों के सहारे

दूर-दूर तक
सोयी पड़ी थी पहाड़ियां
अचानक टीले करवट बदलने लगे
जैसे नींद में उठ चलने लगे.

एक अदृश्य विराट हाथ बादलों-सा बढ़ा
पत्थरों को निचोड़ने लगा
निर्झर फूट पड़े
फिर घूमकर सब कुछ रेगिस्तान में बदल गया.

शांत धरती से
अचानक आकाश चूमते
धूल भरे बवंडर उठे
फिर रंगीन किरणों में बदल
धरती पर बरसकर शांत हो गए.

तभी किसी
बांस के वन में आग लग गयी
पीली लपटें उठने लगीं,
फिर धीरे-धीरे हरी होकर
पत्तियों से लिपट गयीं.

पूरा वन असंख्य बांसुरियों में बज उठा,
पत्तियां नाच-नाचकर
पेड़ों से अलग हो
हरे तोते बन उड़ गयीं.

लेकिन भीतर कहीं बहुत गहरे
शाखों में फंसा
बेचैन छटपटाता रहा
एक बारासिंहा.

सारा जंगल कांपता हिलता रहा.

लो वह मुक्त हो
चौकड़ी भरता
शून्य में विलीन हो गया
जो धमनियों से
अनंत तक फैला हुआ है.


(कुमार गन्धर्व का गायन सुनते हुए)
-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)

और इसी कविता के साथ सुनिए कबीर का 'अवधू! कुदरत की गति न्यारी',
जहां कबीर और कुमार साहब मिलकर अवधू लोगों का मज़ा ले रहे हैं!

8/30/10

शमशेर की दो कविताएं

शमशेर क़ी जन्म शताब्दी चल रही है। कुछ कुछ लिखा पढ़ा जा रहा है। उन पर पढ़ने लायक पुराने कामों में साही का शमशेर क़ी काव्यानुभूति क़ी बनावट और बुनावट नाम का लेख है, आप उससे सहमत हों या नहीं। इस लेख में साही शमशेर को शुद्ध कवि बताते हैं। दूसरा लेख नामवर जी का है जो उन्होंने शमशेर प्रतिनिधि क़ी भूमिका के तौर पर लिखा था। इस लेख में शमशेर के काव्य मर्म को छूते हुए टिप्पणी क़ी गयी है पर फिर वही 'कवियों के कवि' वाली बात। तीसरा लेख रामविलास जी का है जो क़ि शमशेर के गद्य पर है। लेख अच्छा है पर वह सिर्फ गद्य पर है। अभी सुना क़ि रचना समय का कोई अंक उनपर केन्द्रित कर के निकला गया है। विशेष अंक तो मैंने एक और देखा था पर ऐसा कुछ ख़ास देखने को नहीं मिला।
अभी तक सिर्फ गजानन माधव मुक्तिबोध का लेख है जो शमशेर को पढ़ने में मदद करता है। किसी आलोचक का लेख हमारी मदद नहीं कर पाता, जितना मैंने पढ़ा है। खासकर उन कविताओं को जिनमें शमशेर जी का चित्रकार भी शरीक होता है उनके कवि के साथ।
जो हो, उनकी दो कवियायें पेश हैं,
जो
अभी तक उनके विवेचको के लिए चुनौती ही बनी हुई है-

शिला का खून पीती थी

शिला का खून पीती थी
वह जड़
जो क़ि पत्थर थी स्वयं।

सीढियां थीं बादलों क़ी झूलतीं,
टहनियों-सी

और वह पक्का चबूतरा,
ढाल में चिकना :
सुतल था
आत्मा के कल्पतरु का?


सींग और नाखून

सींग और नाखून
लोहे के बख्तर कन्धों पर।

सीने में सूराख हड्डी का।
आँखों में : घास क़ाई क़ी नमी।

एक मुर्दा हाथ
पाँव पर टिका
उलटी कलम थामे।

तीन तसलों में कमर का घाव सड़ चुका है।

जड़ों का भी कड़ा जाल
हो चुका पत्थर।

8/20/10

काश्मीर क़ी घाटी


काश्मीर की घाटी



काली माई ने अबकी हो!
किसका खून पिया है?
यह विशाल नरमेध यज्ञ हो!
बाकी कौन जिया है?



जी मार दिए नव तरुण-तरुणियाँ
मार दिए बागान

जी
मार दिए केसर के महमह खेत
संगीनों से रेत-रेत कर हत्या कर दी है
हंसी-खेल में मुल्क हुआ शमसान

एक तो मारेंगें
दूसरे रोने न देंगे,
गर कहीं पत्थर उठाया
तीसरे वे गोलियों से भून देंगें.
चार खूंटे ठोंक कर,
जीना बना देंगे कठिन
जटिल कर देंगे हवा में सांस लेना वे,
पोखरों में जहर घोलेंगे
औ आँखें फोड़ देंगे
औ कहेंगे हम तुम्हारी ही हैं करते बात!

कौन है वह राष्ट्र, वह धृत राष्ट्र
जहाँ अंधी नाचती है योगमाया,
अपनों ने भी कसर कहाँ बाकी रक्खी है,
कुटिल भुजंगिनी भारत क़ी सरकार-
एक समूची सभ्य जाति क़ी बलि लेकर भी
दांत दिखाती, लालकिले से करती जाये टनों मसखरी.
ज़री-काम करती भाषण में,
चाक करे है दिल दिमाग.

सस्ती मौत, सस्ती मौत
बेहद सस्ती मौत!
गोली से लाठी से चाकू-संगीनों से
आंसू गैस से बम से
छर्रों से वाटर पाईप से
तन से मन से धन से
मारो, मारो मारो
लालकिले से
मारो
भूख गरीबी महंगाई सब चंडूखाने क़ी गप्पें हैं!
मारो, इस्लामाबाद से मारो
घर में घुस कर मारो
गली गली में मारो
बाढ़ लगी है
घर-दुआर औ पशू-परानी, गल्ला-गेहूं, छाता-जूता नाश हो गए!
जनता को यह चिल्लाने दो !

मार पाई क्या इराकी जनता को सेना,
मार पाई क्या क्लस्टर बम से मन ?
बित्ते भर क़ी भगतसिंह क़ी पार्टी को क्या मार पाए थे अंगरेजी हुक्काम ?
मार सकी क्या भूमिहीन मजदूरों के जन आन्दोलन को
कोई भी सरकार ?
मर सकती क्या आज़ादी क़ी आग?

अभी बर्फ जब जम जाएगी
जभी हिमालय जिन्दा होगा
खून के थक्के बन जाएँगे
जिन्दा-दिल हथियार
प्रतिरोधी कश्मीरी जनता
रक्त पिपासु काली के हाथों का खप्पर तब छीनेगी
इब्लीशों का नाश करेगी
उठा पटक देगी सरकारों का कंकाली ढांचा
असली डेमोक्रेसी अपने लिए बुनेगी
अपने मन से अपने तन से जोड़ेगी
नए नए उद्योग
और अपने बल से अपनी जन्नत को फिर
हासिल कर ही लेगी
धीरज रक्खो!

मृत्युंजय/ बंगलुरु

8/19/10

शमशेर

शमशेर हिंदी के ही नहीं, संसार के अप्रतिम कवियों में एक हैं। वे प्रेम को उसकी द्वंद्वात्मकता में महसूस करते हैं। तो दया, सहानुभूति के चक्कर और ही दाता का भाव। माशूक के लिए कुर्बान होने क़ी जिद क़ी बजाय वे ग़ालिब के
ज्यादा नजदीक हैं। ' तो फिर संगे-दिल तेरा ही संगे-आस्तां क्यूं हो' वाले ग़ालिब क़ी अगली कड़ी हिन्दुस्तानी कविता में तब हाथ लगती है जब शमशेर
लिखते हैं- 'हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं, जिनमें वे फंसने नहीं आतीं' एंगेल्स रचना में विचारधारा को छुपा हुआ मानने के हिमायती थे। शमशेर क़ी कविताएँ इसी चुनौती के साथ लुभाती हैं। उसको
समझने के लिए मुक्तिबोध का सूत्र मेरे तो काफी काम आया-
"अंधियाली मिट्टी क़ी गीली-गीली परतों
में डूबो, डूबो, गड़ो, और गल जाओ"
दो कविताएँ पेश हैं, शमशेर जी को याद करते हुए-


लेकर सीधा नारा


लेकर सीधा नारा
कौन पुकारा
अंतिम आशाओं क़ी संध्याओं से?

पलकें डूबी ही-सी थीं -
पर अभी नहीं;
कोई सुनाता-सा था मुझे
कहीं;
फिर किसने यह, सतो सागर के पार
एकाकीपन से ही, मानो-हार,
एकाकी हो मुझे पुकारा
कई बार?

मैं समाज तो नहीं; मैं कुल
जीवन;
कण-समूह में हूँ मैं केवल
एक कण।

कौन सहारा !
मेरा कौन सहारा !

(1941)



चुका भी हूँ मैं नहीं !


चुका भी हूँ मैं नहीं
कहाँ किया मैंने प्रेम
अभी।

जब करूंगा प्रेम
पिघल उठेंगे
युगों के भूधर
उफान उठेंगे
सात सागर।
किन्तु मैं हूँ मौन आज
कहाँ सजे मैंने साज़
अभी।

सरल से भी गूढ़, गूढ़तर
तत्त्व निकालेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
ह्रदय।

निकटतम सबकी
अपर शौर्यों क़ी
तुम

तब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख


तुम बनोगी तब
प्राप्य जाय !

(1941)


शमशेर बहादुर सिंह

रोना

मैं रोना चाहता हूँ!

आंसू भरे हुए दिमाग पर जोर डाल रहा हूँ
कि बूँद भर भी नहीं निकलेगा आंसू

रोना तो हमेशा किसी के सामने चाहिए

अपने ही सामने बैठ कर रोना
हमेशा की तरफ इस बार भी कम टिका

जब कि मैं चाहता हूँ खूब रोऊँ

इधर उधर देख कर रोना भी
अंततः अपनी तरफ देख कर रोना बन जाता है

इसमें सोने की तुक मिला दूँ क्या?
या फिर खोने का?

(ये पेंटिंग मेरे एक प्रतिभाशाली बेरोजगार दोस्त अनुपम की है.)

मृत्युंजय/बंगलुरु

8/18/10

रोज़गार की बेरोजगारी

बेरोजगारी के जमाने में पक्का बेरोजगार होना काफी मुश्किल है!
क्योंकि इसका मतलब होगा बेरोजगारी का रोज़गार.

वैसे हर रोज़गार रोज रोज किसी ग़ार में जाने से कम नहीं
और 'बे' साहब का यह तखल्लुस भी काफी जमता है उनपर
फिर भी दिल है के फुर्सत के बहाने ढूँढने के लिए राजी ही नहीं होता .

फरेब की छोडिये, अमरीकियों और उनके चेलों चपाटों के लिए
मैं तो राजी हूँ कि -मानदारी बरतूंगा
एफ-एक्टिविस्ट भी बनूँगा
डी-कंस्ट्रक्ट हो जाऊंगा
पर जिम्मा तो ले कोई
रोज़गार की बेरोजगारी का

मृत्युंजय/बंगलुरु

8/15/10

पास रहो ! -मुक्तिबोध

मुक्तिबोध को एकबार एक आलोचक साब ने पौरुष का कवि घोषित किया,चलिए ये तो फिर भी भला पर बाद उसके, कहा उन्होंने, कि उनकी कविताओं में प्रेम और स्त्री, दोनों गायब हैं.उनके बिम्ब प्रतीक सब पौरुष वाले हैं.
भले मानुष की बात का जवाब क्या देना और नाम में क्या रखा है, पर बात की बात में यह
कविता याद आई, देखिये
और देखते रह जाइए-




तुम चाहे जो हो
नारी, या देश या विश्व
बालक या युवा अश्व
सर्वोत्तम जो भी है-
फुश्पा या चुम्बन या लक्ष्य
श्रेष्ठतम स्वप्नों के कक्ष
वह तुम हो!!
और जो भी है मेरे पास
मन-भीतर
आग या रस
बेबस ह्रदय का बस
सब तुम्हें देने को
उमड़ता है जी!!
और ये, सब देकर
जो कुछ शेष
जैसे दुःख के दारिद्र्य के लत्तर
कमजोरी के बुरे-बुरे रूप स्वरुप बुरे बुरे वेश
उन सबसे
अपने को छिनना भिन्न करने का लक्ष
अभिन्न नहोना है
यानी तुम्हे पाना है
अपने अकेले में न जाने कबसे
लड़ते रहने का कार्य
यह सब स्वीकार्य
बशर्ते कि तुम रहो पास
सहास!!

8/11/10

गेहूं दो, चावल दो !



1967 में लिखी नागार्जुन की यह कविता पेश है.
कविता में बाबा ने हिन्दुस्तानी दलालों को लक्ष्य बनाया है.
सबसे जोरदार है अंदाज़े बयां -


गेहूं
दो, चावल दो !


गेहूं दो, चावल दो !
इतना दिया, और दो, पुष्कल दो !
गंगा बेकार है, हडसन का जल दो !
चारा दो, फल दो !
हिलेगी कैसे, दुम में बल दो !
गेहूं दो, चावल दो !!

जीत हम जाएँ, सवालों का हल दो !
बटोर लिए हैं राजा-रानी, मोर पंख झल दो !
धोखा खा जाएँ पड़ोसी, ऐसी अकल दो !
उगे हैं बगावत के अंकुए, उनको मसल दो !
रंगी हैं तरुण निगाहें, जादुई काजल दो !

जपे हैं नाम बहुत, उसका फल दो !
फिलहाल गेहूं दो, चावल दो !
और दो, अधिक दो, पुष्कल दो !
कानो को भले बराबर मल दो !
हिलेगी खूब, दुम में बल दो !

8/9/10

मैं कुछ न कुछ बच जाता था

मौत से तकसीम होने (बँट जाने)की यह अदा अफ़ज़ाल के शायर की
तल्खी है जो उर्दू शायरी की बहु स्तरीय अर्थ परंपरा का बखूबी निर्वाह कराती है.
अगर मौत अनंत है तो शायर भी अनंत हुआ और अगर वह सिफ़र है तो
शायर भी सिफ़र हुआ. अलग अलग वजहों से इंसान को तकसीम करने वाली
व्यवस्था जब डर जाती है इंसानी जिजीविषा से तो अंत में मौत की सहायता से
इंसानी वजूद को तकसीम करती है. पर इस तकसीम से दोनों रस्ते खुलते हैं-
सिफ़र का भी और अनंत का भी. या कहिये तो मौत के भी अलग अलग रूप
हो सकते हैं और उससे आगे की बात बदल सकती है.
जो हो, अफ़ज़ाल की शायरी के यही तो मज़े हैं-

मैं कुछ न कुछ बच जाता था

मुझे फाकों से तकसीम किया गया
मैं कुछ न कुछ बच गया

मुझे तौहीन से तकसीम किया गया
मैं कुछ न कुछ बच गया

मुझे न इंसाफी से तकसीम किया गया
मैं कुछ न कुछ बच गया

मुझे मौत से तकसीम किया गया
मैं पूरा पूरा तकसीम हो गया

...
अफ़ज़ाल अहमद सैयद

8/6/10

ग़ालिब : चंद अशआर

बहुत दिनों बाद अचानक यह ग़ज़ल नज़र से गुज़री
सोचा इसके कुछ शेर हज़रात के सामने पेश करूं.
इसको पढ़ते ही फिराक़ साहब का वो शेर याद आता है-
"पास रहना किसी का रात की रात
मेहमानी भी, मेजबानी भी"
खैर, ग़ालिब की ग़ज़ल के कुछ शेर यूं हैं -




मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए
जोशे कदह से बज़्म चरागाँ किये हुए

करता हूँ जमा फिर जिगरे लख्त लख्त को
अरसा हुआ है दावते मिश्गां किये हुए

फिर चाहता हूँ नाम ए दिलदार खोलना
जां नजरे दिल फरेबिए उन्वां किये हुए

मांगे है फिर किसी को लब ए बाम पर हवस
जुल्फे सियाह रुख प परीशां किये हुए

दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन
बैठे रहें तसव्वुरे जाना किये हुए

8/4/10

प्रार्थना

एक कविता ऐसी जो बचपन में
सुनी थी, हमारे गाँव के एक
पुजारी जी थे, जीवन भर सिर्फ
एक ही प्रार्थना क़ी।
अन्य शास्त्र आदि उनसे साबका
न रख पाए.

आप भी उनकी प्रार्थना सुनिए-

जय जगदीश, जय जगदीश
गाय दा बीस भैंस दा तीस
रहरी के दाल जड़हने क भात
गलगल नेबुआ औ घिव तात
जय जगदीश!

कवि की झुंझलाहट




यह कविता ऐसे तो
सामान्य
रूप में काव्य क्षेत्र के भीतर
एकाधिकार
को प्रतिष्ठित करती है
पर
एक झुंझलाए हुए कवि
सुन्दर
की हालत तो देखिये!





बोलिए तौ तब जब बोलिबे की बुद्धि होय,
ना तो मुख मौन गहि चुप ह्वै रहिये!!
जोरिये तो तब जब जोरिबे की रीति जानै,
तुक, छंद, अर्थ अनूप जामे लहिये!!
गाइए तो तब जब गाइबे को कंठ होय,
श्रवन के सुनतही मनै जाय गहिये!!
तुकभंग, छ्न्दभंग, अर्थ मिलै न कछू,
सुन्दर कहत ऐसी बानी नहीं कहिये!!

जिससे मोहब्बत हो


जिससे मोहब्बत हो
उसे निकाल ले जाना चाहिए
आख़िरी कश्ती पर
एक मादूम होते शहर से बाहर

उसके साथ
पार करना चाहिए
गिराए जाने की सजा पाया हुआ एक पुल

उसे हमेशा मुख़्तसर नाम से पुकारना चाहिए

उसे ले जाना चाहिए
जिंदा आतिशफसानों से भरे
एक ज़जीरे पर

उसका पहला बोसा लेना चाहिए
नमक की कान में
एक अज़ीयत देने की कोठरी के
अन्दर

जिससे मोहब्बत हो
उसके साथ टाइप करनी चाहिए
दुनिया की तमाम नाइंसाफियों के खिलाफ
एक अर्ज़दाश्त

जिसके सफ़हात
उदा देने चाहिए
सुबह
होटल के कमरे की खिड़की से
स्वीमिंग पूल की तरफ


अफजाल अहमद



"मादूम-गायब, नष्ट
आतिश फ़साना- ज्वालामुखी
ज़जीरा- द्वीप
कान-खदान
अज़ीयत-यातना"

7/29/10

एक पागल कुत्ते का नौहा

एक पागल कुत्ते का नौहा

एक मजदूर क़ी हैसियत से
मैंने ज़हर क़ी एक बोरी
स्टेशन से गोदाम तक उठाई
मेरी पीठ हमेशा के लिए नीली हो गयी

एक शरीफ आदमी क़ी हैसियत से
मैंने अपनी पीठ को सफ़ेद रंगवा लिया

एक किसान क़ी हैसियत से
मैंने एक एकड़ जमीन जोती
मेरी पीठ हमेशा के लिए टेढ़ी हो गई

एक शरीफ आदमी की हैसियत से
मैंने अपनी रीढ़ क़ी हड्डी निकलवाकर
अपनी पीठ सीधी करवा ली

एक उस्ताद क़ी हैसियत से
मुझे खरिया मिट्टी से बनाया गया

एक शरीफ आदमी की हैसियत से
ब्लैक बोर्ड से

एक गोरकन की हैसियत से
मुझे एक लाश से बनाया गया
एक शरीफ आदमी क़ी हैसियत से
मरहूम क़ी रूह से

एक शायर क़ी हैसियत से
मैंने एक पागल कुत्ते का नौहा लिखा

एक शरीफ आदमी क़ी हैसियत से
उसे पढ़कर मर गया.

अफ़ज़ाल अहमद

3/2/10

थक जाने के बाद


थक जाने के बाद,
रंग क्या कहते हैं?

जब जभी आती है शबे होली
तुम्हारे बदन के रंग आबनूसी रंगों में घुल जाते हैं

मिलने दो रंगों को आपस में
आबनूसी नीला लाल जोगिया पीला सब्ज़
उस पैराहन को ओढो बिछाओ
जो रंगीनियों में डूब गया है

अंत नहीं है यह
यही मुकम्मल सी इब्तिदा है
जो हमेशा आख़िरी ख़ुशी से भर देती है

चलो इस बार हम तस्कीन करें
क़ि वक्त बेरहम है
प्यार सिर्फ तुम करती हो
क़ि बेपनाह जब मैं कहता हूँ
उसमे एक पनाह है जो बिना मांगे
छीनता हूँ मैं
इस शब् भी

थक जाने के बाद रंग
संग साथ खोजते हैं

रंगीन मायः के जो आबसार जिन्दा हो
ढला करे हैं फकत शबे वक्त होली में
के उनकी कसम
ख्वाबीदा आँखों के सब ख्वाब सुर्खरू होंगे
तुम कह रही थीं
कौन सुनता था ?

वो हज़ारहाँ वाइदे
जो मैंने किये
वो चुक गए और मैंने पाया ये
के जिक्रे मीर से मीर होना एक खराबी है
जो दिल में उतरती है
चाक करती है
वो शब् तुम्हारी नेमतों से है

जो थक गए हैं रंग
और गाढ़े हैं यारब
रुको जो प्यास के पत्थर पे
इंतिजार करो !


मृत्युंजय
बंगलुरु / इलाहाबाद

2/17/10

भूतों की कहानियों में प्रेम

"प्रेम क़ी भूतकथा "
पर कुछ नोट्सनुमा

यह उपन्यास देर से पढ़ पाया, पर मज़ा गया. मुझे कहने दीजिये क़ि अभी तक के आपके कथा संसार में यह सबसे ज़बरदस्त है. अधूरेपन की शिकायत, कथा के बाहर के दबाव, है तो बस एक घनघोर रवानी. "प्रेम की भूतकथा" में ऐसा क्या है जो मुझे इतना आकर्षित करता है? पहली बात है वह भाषा. यह भाषा मुझे अनुवाद की भाषा लगी, अपनी सारी सामर्थ्य में. कभी आपके द्वारा किये गए अनुवाद पढ़ने का मौका नहीं मिला पर कह सकता हूँ क़ि आप एक बेहतरीन अनुवादक हैं. अनुवाद इसलिए याद आया क्योंकि भारतीय औपनिवेशिक देश-काल में उपनिवेशकों और उपनिवेशितों की संस्कृति के बीच एक खास तरह का संवाद इस किताब में मौजूद है. पूरा मसूरी इन भूतों के साथ एक द्वंद्वात्मक सम्बन्ध बनाये हुए है, और यही वह बात होगी जहाँ मेरे जैसे पाठक के लिए यह उपन्यास रोचकता का सृजन करता है. अंग्रेज होते हुए भी ये भूत हमारे स्मृति में हिन्दुस्तान के ही भूत हैं. एक भूली हुई कहानी के ये वाहक हैं, जो अनिवार्यतः हमारे अतीत का हिस्सा है, और हम उस अतीत के रू रू होना चाहते हैं.भूत क्या करते हैं? ज़बरदस्त किस्सागो होने के नाते उनके ऊपर ये ज़िम्मेदारी आयद होती है क़ि वे हमें परेशान करें, हमारा जी दुखाएं और हमको सहने क़ी ताकत अता करें. इस उपन्यास के भूत एक सीधे दुखांत को हमारे लिए एक सहनीय वृत्तान्त में बदल देते हैं. वे हमारे लिए अतीत को एक दूरी पर ले जाते हैं. वे कथा के उन हिस्सों को रेखांकित करते हैं, जो ज्यादा ज़रूरी हैं. वे अपने बयान क़ी ताकत से और अतीत से अपने रिश्तों के बलबूते कथा को नितांत पुरानी बनने से रोकते हैं और पाठक को चुनने का मौका देते हैं. यह जरूर है क़ि विकल्प उनके अपने मिजाज़ से तय होते हैं. जेम्स क़ि हत्या किसने क़ी, यह सवाल, भूत बीच में लटका हुआ छोड़ देते हैं क्योंकि हत्या क़ी स्टोरी चाहने वाले संपादक के खिलाफ वे एलन क़ी कहानी को अधिक जरूरी मानते हैं. यहीं हम फिर एक बार भूतों का अजीमुस्सान कारनामा देखते हैं, हत्या क़ी कहानी के दायरे फैलने लगते हैं और एक पुराने इश्क क़ी नयी कहानी वृत्तान्त क़ि शक्ल हासिल कर लेती है. ठीक यही, किसी जासूसी उपन्यास या के किसी सही घटना के वर्णन से अलग यह कहानी अपने लिए नया रास्ता खोलती है, यथा-अर्थ को रचाने का रास्ता. क्या यह कहानी मुझे असफल प्रेम क़ी पुरानी कहानियों , जिनमे बलिदान देना होता था, क़ी याद दिलाती है? चंद्रधर शर्मा गुलेरी क़ी 'उसने कहा था' और जयशंकर प्रसाद क़ी 'पुरस्कार' को याद करना कैसा रहेगा? इनमे से पहली में लहनासिंह और दूसरी में ममता शहीद होते हैं. पहली कहानी में लहना अपने बचपन के एक आकर्षण और अपने मालिक के प्रति अपनी स्वामिभक्ति को मिला लेता है. दूसरी में ममता अरुण के प्रति अपने विकसित प्रेम को राज्यभक्ति के साथ मिलने क़ी कोशिश करती है. इन दोनों कहानियों में रजा या मालिक के साथ, कहिये राजभक्ति के साथ प्रेम का गहरा रचाव है. चूँकि यह कथा औपनिवेशकों क़ी है, इसलिए मैं ऊपर क़ी कहानियों में पसरे ताने बाने से इस कथा क़ी तुलना नहीं कर सकता. औपनिवेशकों के लिए राज्यभक्ति के मायने अगर खोजे भी जाये तो वे बेहद अलग होंगे. इस कहानी में हम प्रेम के पुराने परिचित ढांचे के जगह एक दूसरा अपरिचित ढांचा देखते हैं. और जैसा के पहले मैंने कहा, यह भी हमारे अतीत का हिस्सा है.भूतों का वक्त के साथ क्या रिश्ता है?वे वक्त को लीनियर नहीं रहने देते, वे वर्त्तमान में नहीं हैं ,वे भूत हैं, पर कहानी में निपट वर्त्तमान के किस्सागो है. वे अवसाद से घिर जाने से हमको बचा लेते हैं. दलालों के जीवन चरित छापते संपादकों क़ी दुनिया से, अनायास नहीं क़ि भूत दिलचस्पी नहीं रखते हैं.हाँ, एक बात थोड़ी खटकती है क़ि पत्रकार को बहुत पहले, पाठक के साथ ही, मिस बीन क़ि कहानी शुरू होने के साथ ही कथा समझ लेनी चाहिए! वह ऐसा कर के अंत में बीन के भूत को रुलाता क्यों है? शानदार उपन्यास लिखने के लिए बधाई.


मृत्युंजय
इलाहाबाद / बंगलुरु

1/18/10

रंग-बिरंगे सपने










मैं रंग-बिरंगे सपनों के
नीले दर्पण में
लाल-हरे मस्तूलों वाली
मटमैली सी नाव संभाले
याद तुम्हारी झिलमिल करती श्याम देह
केसर क़ी आभा से
गीला है घर बार
मार कर मन बैठा हूँ
ख़ाली मन की ख़ाली बातें
रातें हैं बिलकुल खामोश
डर लगता है.

मृत्युंजय

महबूब के तिलों से प्यारे हैं तिल के लड्डू
















जाड़े के लिहाज़ से
नजीर क़ी यह कविता पेशे-खिदमत है,
उम्मीद है काम आएगी!

                तिल के लड्डू                     


जाड़े में फिर खुदा ने खिलवाये तिल के लड्डू
हर एक खोमचे में दिखलाये तिल के लड्डू
कूचे गली में हर जा बिकवाये तिल के लड्डू

हमको भी हैंगे दिल से खुश आये तिल के लड्डू
जीते रहें तो यारो फिर खाए तिल के लड्डू!

उम्दों ने सौ तरह की याकूतियाँ बनाई
लोंगों में दालचीनी शक्कर भी ले मिलाई
सर्दी में दौलतों क़ी सौ गर्म चीजें खाईं
औरों ने डाल मिश्री गर पेड़ियाँ बनाईं
हमने भी गुड़ मंगाकर बंधवाये तिल के लड्डू!

रख खोमचे को सर पर पैकार यूँ पुकारा
बादाम भूना चाबो और कुरकुरा छुहारा
जाड़ा लगे तो इसका करता हूँ मैं इजारा
जिसका कलेजा यारों सर्दी ने होवे मारा
नौ दाम के वह मुझसे ले जाए तिल के लड्डू!

जाड़ा तो अपने दिल में था पहलवां झंझाडा
पर एक तिल ने उसको रग रग से है उखाड़ा
जिस दम दिलो जिगर को सर्दी ने आ लताड़ा
ख़म ठोंक हमने वोंही जाड़े को धर पछाड़ा
तन फेर ऐसा भभका जब खाए तिल के लड्डू!

कल यार से अपने मिलने के तैं गए हम
कुछ पेडे उसकी खातिर खाने को ले गए हम
महबूब हंस के बोला हैरत में हो रहे हम
पेड़ों को देख दिल में ऐसे खुशी हुए हम
गोया हमारी खातिर तुम लाये तिल के लड्डू!

जब उस सनम के मुझको जाड़े पे ध्यान आया
सब सौदा थोडा थोडा बाज़ार से मंगाया
आगे जो लाके रक्खा कुछ उसको खुश न आया
चीजें तो वह बहुत थीं पर उसने कुछ न खाया
जब खुश हुआ वह उसने जब पाए तिल के लड्डू!

जाड़ों में जिसको हर दम पेशाब है सताता
उट्ठे तो जाड़ा लिपटे नहीं पेशाब निकला जाता
उनकी दवा भी कोई पूछो हकीम से जा
बतलाये कितने नुस्खे पर एक बन न आया
आखिर इलाज उसका ठहराए तिल के लड्डू!

जाड़े में अब जो यारो ये तिल गए हैं भूने
महबूबों के भी तिल से इनके मज़े हैं दूने
दिल ले लिया हमारा तिल शकरियों क़ि रू ने
यह भी 'नजीर' लड्डू ऐसे बनाए तूने
सुन सुन के जिसकी लज्ज़त घबराये तिल के लड्डू!