12/5/11

कृष्णकान्त की एक कविता

गाँधी के ये नए वंशधर

चिकना चुपड़ा लल्लू खुद को, गाँधी-वंशज कहता है
गांव में आकर खुद को सबका, सच्चा साथी कहता है
जितने का घर-बार हमारा, उतने का तो कुरता उसका
दिल्ली और सीकरी उसकी, रोटी उसकी ज़र्दा उसका

हमने कहा कि महंगाई है, भकुआ चुप्पैचाप रहा
हम बोले कि घर नाहीं है, भकुआ चुप्पैचाप रहा
हम बोले गगरी खाली है, भकुआ चुप्पैचाप रहा
बस्ती का बच्चा-बच्चा है, ठण्ड-भूख से कांप रहा

कलावती से प्यार जताकर, कुछ बच्चों को गोद उठाकर
कई बार मेरे ही घर को, वह अपना घर-बार बता कर
चला गया है मूर्ख बनाकर, इसके सारे राज़ पता कर
कौन है यह अंग्रेज का बच्चा, सरपत को गन्ना कहता है

किस चक्कर में आता है यह, तरह-तरह चालें चलता है
अख़बारों में काहे इसका, बड़ा-बड़ा फोटो छपता है
आता है हर साल गांव में,  खूब तमाशा करता है
सब बच्चों से रामराज का, झूठा वादा करता है

कहीं मुश्किलें सारी हमने,  नहीं किसी पे कान दिया
अगले ही दिन अपना तम्बू, बगल गांव में तान दिया
आठ महीने से घर में, कोई भी सालन नहीं बना
कोदौ-किनकी नहीं मयस्सर, कहाँ मिलेगा खीर-पना

कुछ-कुछ दिन पर भूख के मारे, कोई न कोई मरता है
आँख बंद है कान बंद है , और ज़मीर पर पर्दा है
अबकी आये टेन्ट लगाये,  सारे बल्ली-बांस तोड़ दो
बंद करो यह नाटक अब , हम सबको अपने हाल छोड़ दो

11/14/11

श्री अन्ना हजारे और उनकी टीम के नाम खुला ख़त

श्री अन्ना हजारे और उनकी टीम के नाम खुला ख़त
भाकपा (माले), उत्तराखंड राज्य कमेटी

आदरणीय श्री अन्ना हजारे 
और उनकी टीम के सम्मानित सदस्य,

अभी बहुत समय नहीं बीता जब पूरा देश जन लोकपाल की मांग को लेकर आपके द्वारा किये गए आंदोलन तथा अनशन के समर्थन में सडकों पर उतर पड़ा था. आपके आंदोलन को जो प्रचंड जन समर्थन मिला, उसके मूल में भ्रष्टाचार से त्रस्त देश के आम आदमी की पीड़ा थी. आपने भी देश को बताया कि इस भ्रष्टाचार को खत्म करने का सबसे प्रभावी तरीका एक सशक्त लोकपाल ही है. हमारी पार्टी- भाकपा (माले) लिबरेशन, ये मानती है कि भ्रष्टाचार कोई नैतिक मामला नहीं है बल्कि राजनीतिक और नीतियों का मसला है; आज जो चरम भ्रष्टाचार इस देश में व्याप्त है, उसके मूल में वो नवउदारवादी नीतियां हैं जिन्हें 1991 में केंद्र सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए डा.मनमोहन सिंह ने लागू किया और उसके बाद आने वाली हर पार्टी-जिसमे भाजपा सबसे प्रमुख है- की सरकार ने आगे बढ़ाया. इन नीतियों को उलटे बगैर भ्रष्टाचार का खात्मा संभव नहीं है. न्यायपालिका, सेना, कारपोरेट घरानों, स्वयंसेवी संगठनो, मीडिया को लोकपाल के दायरे में लाने की समझदारी के साथ हमारी पार्टी ने भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध आम आदमी के आक्रोश की अभिव्यक्ति वाले इस आंदोलन का समर्थन किया था.

हम समझते थे कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मुद्दे के प्रति लड़ने के लिए आप प्रतिबद्ध हैं. परन्तु उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री (फ़ौज से दो दशक पहले सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे मेजर जनरल ही कहलाना पसंद करते हैं) भुवन चंद्र खंडूड़ी द्वारा उत्तराखंड की विधान सभा में पेश किये गए- उत्तराखंड लोकायुक्त विधेयक, 2011 पर आपने जिस तरह तारीफों की पुष्प-वर्षा की, वह न केवल बेहद चौंकाने वाला है बल्कि अफसोसजनक भी है. जिस तरह आपने श्री खंडूड़ी का महिमामंडन किया, उससे तो ऐसा लग रहा था कि जैसे श्री खंडूड़ी ने वाकई कोई युगान्तकारी कारनामा कर दिया है. श्री अरविन्द केजरीवाल तो खंडूड़ी जी की ही तारीफ़ करके नहीं रुके बल्कि उन्होंने प्रमुख सचिव दिलीप कुमार कोटिया पर भी तारीफों के फूल बरसाए.

पर क्या वाकई खंडूड़ी जी द्वारा लाया गया- उत्तरखंड लोकायुक्त विधेयक, उतना ही चमत्कारिक है, जितना आप उसे बता रहे हैं? हमारी समझदारी ये कहती है कि नहीं, उक्त विधेयक इस तारीफ का हक़दार कतई नहीं है. बल्कि इसके उल्ट यह विधेयक ऊँचे पदों पर बैठ कर भ्रष्टाचार करने वालों के प्रति कार्यवाही तो दूर की बात है, शिकायत करना भी असंभव बना देता है. उत्तराखंड लोकायुक्त विधेयक, 2011 का अध्याय- छ: जिसका शीर्षक है – उच्च कृत्यकारियों के विरुद्ध अन्वेषण और अभियोजन- उसकी धारा 18 कहती है कि

“निम्नलिखित व्यक्तियों के विरुद्ध कोई अन्वेषण या अभियोजन लोकायुक्त के सभी सदस्यों की अध्यक्ष के साथ पीठ से अनुमति प्राप्त किये बिना प्रारंभ नहीं की जायेगी-

(1) मुख्यमंत्री और मंत्रीपरिषद के कोई अन्य सदस्य ;
(2) उत्तराखंड विधानसभा के कोई सदस्य


महोदय, उक्त प्रावधान से यह स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ तभी शिकायत और कार्यवाही की जा सकेगी, जबकी लोकायुक्त की संपूर्ण पीठ और उसका अध्यक्ष इस बात पर एकमत हों कि ऐसा करना है. लोकायुक्त की पीठ के एक भी सदस्य का इनकार इसमें वीटो का काम करेगा और इस तरह मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ उत्तराखंड लोकायुक्त विधेयक, 2011 के तहत बनने वाले लोकायुक्त के समक्ष शिकायत दर्ज करा पाना ही लगभग असंभव होगा.

अब जरा उत्तराखंड की राजनीतिक परिस्थितिओं की रोशनी में लोकायुक्त विधेयक में किये गए प्रावधानों का निहितार्थ समझने का प्रयास करें. कांग्रेस के भ्रष्टाचार और कुशासन के पांच साल बाद 2007 में उत्तराखंड में भाजपा की सरकार बनी और श्री भुवन चंद्र खंडूड़ी मुख्यमंत्री बनाये गए. 2009 में लोकसभा चुनाव में भाजपा की उत्तराखंड की पाँचों सीटों पर पराजय के बाद श्री खंडूड़ी को हटाकर, श्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' को मुख्यमंत्री बनाया गया. अपने सवा दो साल के मुख्यमंत्री काल में निशंक पर लगातार घपले-घोटालों के आरोप लगते रहे, जिसमे कुम्भ आयोजन में घोटाले की तो कैग ने भी पुष्टि कर दी है. साथ ही 56 लघु जल विद्युत परियोजनाओं के आवंटन में घोटाला, सिटुर्जिया बायोकेमिकल्स की जमीन स्टर्डिया डवेलपर्स को हस्तांतरण में घोटाला आदि भी उनके कार्यकाल के चर्चित घोटाले रहे. खनन माफिया के खिलाफ तो अनशन करते हुए स्वामी निगामानंद के प्राण चले गए पर निशंक और उनकी सरकार के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई. भ्रष्टाचार की बढती चर्चाओं, भाजपा की अंदरूनी उठापटक और 2012 की शुरुआत में होने वाले विधान सभा चुनाव को देखते हुए निशंक को हटा कर खंडूड़ी मुख्यमंत्री बना दिए गए. अब भ्रष्टाचार में डूबे हुए निशंक के खिलाफ कोई खंडूड़ी जी द्वारा बनाये गए लोकायुक्त से शिकायत करना चाहे तो ये उक्त विधेयक के प्रावधान के अनुसार असंभव है क्यूंकि निशंक आज मुख्यमंत्री भले ही न हों, परन्तु विधायक वे अभी भी हैं और विधायकों पर कार्यवाही के लिए तो लोकायुक्तों की पीठ के सभी सदस्यों की सहमति अनिवार्य है. इस तरह देखें तो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री भुवन चंद्र खंडूड़ी द्वारा लाया गया लोकायुक्त विधेयक भ्रष्टाचार उन्मूलन के बजाय अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' को किसी भी कार्यवाही से बचाने के लिए लाया गया विधेयक है.


खंडूड़ी जी ने 2007 में मुख्युमंत्री के अपने पहले कार्यकाल में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के 56 घोटालों की जांच की घोषणा की थी. ये जांच आज तक पूरी नहीं हो सकी है. बहरहाल यदि कोई इन घोटालों के मामले में भी खंडूड़ी जी के लोकायुक्त से कार्यवाही के अपेक्षा करे तो उन कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ कार्यवाही शुरू करना ही संभव नहीं होगा, जो विधायक होंगे, यानि अपनी पार्टी के ही नहीं विपक्षी भ्रष्टाचारियों को बचाने का पुख्ता इंतजाम खंडूड़ी जी ने अपने लोकपाल में किया है.

इतना ही नहीं खंडूड़ी जी के लोकायुक्त विधेयक में तो नौकरशाही के खिलाफ शिकायत और कार्यवाही को भी मुश्किल बनाया गया है. "जांच अथवा अन्वेषण की प्रक्रिया" शीर्षक के अंतर्गत धारा  ७ (7) कहती है  “सरकार के सचिव एवं सरकार के सचिव से ऊपर के प्रकरण में अन्वेषण या अभियोजन केवल लोकायुक्त की पीठ, जिसमे न्यूनतम दो सदस्य और अध्यक्ष हों, से अनुमति प्राप्त करके संस्थित होंगे”. इस तरह देखें तो उच्च पदस्थ नौकरशाहों के खिलाफ शिकायत दर्ज करा पाने को भी भरसक मुश्किल बनाया गया है.

जहाँ भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों के खिलाफ शिकायत करने के प्रावधान इतने दुष्कर बनाये गए हैं, वहीँ शिकायतकर्ता के खिलाफ, शिकायत सिद्ध न कर पाने और साक्ष्य न दे पाने की स्थिति में यदि लोकायुक्त को यह महसूस हो कि शिकायत किसी प्राधिकारी के उत्पीडन के लिए की गयी है तो शिकायतकर्ता पर एक लाख रुपये तक के अर्थ दंड की व्यवस्था की गयी है (धारा 31). हमारी राजनीतिक व्यवस्था के मारे किस आम आदमी में हिम्मत है कि वो मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायकों, बड़े-बड़े नौकरशाहों का उत्पीडन करने के लिए शिकायत कर सके? जितनी चिंता प्राधिकारियों का उत्पीडन न हो, इसकी है, यदि व्यवस्था चलाने वालों ने उतनी चिंता आम आदमी की की होती तो भ्रष्टाचार, लूट, दमन आज इतने विकराल रूप में नहीं होता. ये प्रावधान भी एक तरह से भ्रष्टाचारियों के बचाव में ही काम आएगा क्योंकि इनसे त्रस्त आम आदमी शिकायत करने से पहले सौ बार सोचेगा कि यदि वह शिकायत सिद्ध नहीं कर पाया तो एक लाख रुपये के दंड का भागी भी बन सकता है.

महोदय, जन लोकपाल जैसी मांग का आंदोलन किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के चमत्कार से परवान नहीं चढा था, बल्कि उच्च पदों पर बैठे भ्रष्टाचारियों के खिलाफ ठोस दंडात्मक कार्यवाही हो, इस आकांक्षा के चलते ही इस आंदोलन का जनता ने समर्थन किया था. लेकिन उस आंदोलन के नेतृत्वकारी- आप लोग, एक ऐसे विधेयक का, जो उच्च पदों पर बैठे भ्रष्टाचारियों के खिलाफ शिकायत करने को भी लगभग असंभव बनाता है, उसका न केवल समर्थन करते हैं बल्कि मुक्त कंठ से उसकी प्रशंसा भी करते हैं तो इसको देश भर में सांप्रदायिक उन्माद फ़ैलाने वाली और उत्तराखंड में चरम भ्रष्टाचार में लिप्त पार्टी के समर्थन के रूप क्या नहीं देखा-समझा जाएगा ? क्या वजह है कि आप क़ानून के इतने बड़े ज्ञाताओं को ये मामूली बातें समझ में नहीं आ रही हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के नाम पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी, एक ऐसा लोकायुक्त विधेयक लाए हैं जिसमे भ्रष्टाचारियों को किसी भी कार्यवाही से बचाने की ठोस व्यवस्था की गयी है ? या फिर इसे भुवन चंद्र खंडूड़ी जी की चतुराई समझा जाये कि भ्रष्टाचारियों को बचाने का कानूनी इन्तजाम भी उन्होंने अपने लोकायुक्त विधेयक के जरिये कर लिया और आप जैसे भ्रष्टाचार विरोधियों और जन लोकपाल समर्थकों को भी शीशे में उतारने में कामयाब रहे ?

प्रश्न तो ये भी है कि जब क़ानून और संविधान की निगाह में सब सामान हैं तो किसी को उसके विरुद्ध होने वाली शिकायतों से सिर्फ इसलिए विशेष प्रावधानों से क्यों बचाया जाना चाहिए कि वह किसी उच्च पद पर बैठा है?

उक्त तमाम बातों के आलोक में भाकपा (माले) की उत्तराखंड राज्य कमिटी आप से ये मांग करती है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी के प्रति जो समर्थन और प्रशंसा आपने लोकायुक्त विधेयक लाने पर जताई है, उसे आप वापस लें और आप की तरफ से भी उनसे ये मांग की जाये कि या तो वे सही मायनों में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों पर लगाम कसने वाला लोकायुक्त बनायें या फिर देश और उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वालों को भ्रमित करने के लिए सार्वजानिक माफ़ी मांगते हुए अपने पद का त्याग कर दें.

सादर,
राजेंद्र प्रथोली, केन्द्रीय कमिटी सदस्य, भाकपा (माले), राजा बहुगुणा, राज्य प्रभारी, भाकपा (माले), उत्तराखंड‌‌, राज्य कमिटी सदस्य- पुरुषोत्तम शर्मा, बहादुर सिंह जंगी, के.के.बोरा, कैलाश पाण्डेय, आनंद सिंह नेगी, जगत मर्तोलिया, इन्द्रेश मैखुरी

11/8/11

भूपेन हजारिका को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

सरकारों के दमन से लरजती दमन उत्तर-पूर्व की भीषण सुन्दर ऊँची-नीची सड़कों पर कभी आपको गुजरने का मौक़ा मिलेगा तो औचक ही भूपेन हजारिका के गाये गीत के बोल कानों में बज उठेंगें- ‘हे डोला, हे डोला, हे डोला...’. भूपेन दा ने वंचितों के श्रम को जिस तरह इस गीत की लय में आबद्ध किया था, वह अपने आपमें एक प्रतिरोध था. उन्होंने ऐसे गीतों की मार्फ़त संगीत की दुनिया को बताया कि संगीत का श्रम से कितना गहरा रिश्ता है, कि संगीत की बेहतरी का कोई भी रास्ता अवाम के संगीत से ही होकर आगे जा सकता है.

१९२६ में असम में पैदा हुए भूपेन हजारिका को अध्ययन की ललक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, कोलंबिया विश्वविद्यालय और शिकागो विश्वविद्यालय तक खींच ले गयी, पर वे हिन्दुस्तान लौटे. १२ साल की छोटी उम्र में ही उन्होंने असमी लोकसंगीत गायक के रूप में ख्याति अर्जित कर ली थी. अपने इलाके की मुश्किलों और संघर्षों के बीच सीखते हुए उन्होंने अपने संगीत को अवाम की जिंदगी का आईना बना दिया. चायबागान के मजदूर हों या मछुवारा समुदाय, इन जुझारू तबकों की जिंदगी को उकेरते उनके लिखे-गाये गीत हमेशा याद किये जाते रहेंगें. इन गीतों में करुणा की एक गहरी अंतर्धारा व्याप्त है जो श्रोता को संघर्ष की जिंदगी के पास खडा कर देती है. भूपेन दा की गहरी मद्धिम आवाज़ में गूंजते ये गीत श्रोता के साथ अद्भुत तादात्म्य बनाते हैं, एका स्थापित करते हैं.

संसद में भी असम का प्रतिनिधित्व करने वाले भूपेन दा का जन-आन्दोलनों से गहरा जुड़ाव रहा आया. सदउ असम जन सांस्कृतिक परिषद के वे संस्थापक अध्यक्ष थे. उल्फा के खिलाफ लड़ते हुए मारे गए शहीद का. अनिल बरुआ और आज के असमी के मशहूर जनगायक लोकनाथ गोस्वामी सहित असमिया आंदोलनधर्मी लोकगीतकारों कलाकारों से उनके गहरे रिश्ते थे.

भूपेन दा का गायन एक तरह से प्रगतिशील आंदोलन के साथ ही बना-बढ़ा. प्रगतिशील आंदोलन के इन पिछले पचहत्तर सालों पर नज़र डालिए तो अनिल बिश्वास, हेमंग विश्वास, शैलेन्द्र आदि जन गीतकारों की धारा ही भूपेन दा के गीतों की ऊर्जा भरती थी. वे इस श्रृंखला की एक मज़बूत कड़ी थे. असमी लोक संगीत को उन्होंने जमीन में गहरे धंस कर हासिल किया था, और उसे उसी गहराई से जमीन और आन्दोलनों से जोड़े भी रखा. उनका लोक, परलोक नहीं है, यह रोजमर्रा की लड़ाईयां लड़ता, संघर्ष की तैयारी करता लोक है.

वे असम की मोजैक जैसी एकता के अलम्बरदार थे. बीच-बीच में असम जातीय संघर्षों और अफरा-तफरी के दौरों से गुजरा पर भूपेन दा के गीतों में साझी असमी संस्कृति की गहरी एका हमेशा मौजूद रही आयी. यह अवाम के साझे दुःख-दर्द और संघर्षों से बनी एका थी.

सुनते हैं भूपेन दा अपने अध्ययन के दिनों में महान अश्वेत नायक-गायक पाल राब्सन के संपर्क में आये  और उनके मिसीसिपी पर लिखे गीत से प्रेरित हो ‘गंगा, तुमि बहिछो कैनो’ (गंगा, बहती हो क्यों) नाम का कालजयी गीत लिखा था. जॉन लेनन, पॉल रॉब्सन जैसे क्रांतिकारी कालजयी गीतकारों के गीतों के साथ इस गीत की जगह दुनिया के प्रतिरोधी गीतों पहली सफ में है.

गीतकार, कवि, कम्पोज़र अभिनेता भूपेन दा के व्यक्तित्व की बहुत सी छवियाँ थीं. बहुमुखी प्रतिभा के धनी भूपेन दा ने असमिया फिल्म और संगीत को दुनिया के पैमाने पर खडा करने में अपना योगदान तो दिया ही, हिन्दी और बांग्ला फिल्म उद्योग को भी उन्होंने कई अभूतपूर्व गीत दिए. रुदाली फिल्म का ‘दिल हूम हूम करे, घबराए’ जैसा गीत विरले ही संभव हो पाता है. उन्होंने फिल्म उद्योग में भी अपनी मूल असमी गायकी की ताकत को ही और विकसित किया था. दादा साहेब फाल्के, संगीत नाटक एकेडमी और पद्मश्री जैसे पुरस्कारों से सम्मानित भूपेन दा कुछ वर्ष पूर्व सत्ता (भाजपा) के बहुत नजदीक पहुँच गये थे, पर जल्दी ही वे इस मोह से छूटे. आम मजूरों-मेहनतकशों के गायक के रूप में किया गया काम आज भी आंदोलन के गीतों की तरह कानों में गूंजता है. 

जनता के इस अप्रतिम गायक को जन संस्कृति मंच अपना सलाम पेश करता है.

जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण द्वारा जारी

10/25/11

जननेता ऐसे होते हैं...

 (कम्युनिस्ट आंदोलन के मशहूर नेता और सामाजिक बदलाव के नायक का. रामनरेश राम के निधन को एक साल पूरे होने को हैं. रामनरेश जी बिहार की राजनीति में गरीब-दलित तबकों की आवाज़ तो थे ही प्रतिरोध और संघर्ष की आप ही मिसाल थे. कल भाकपा-माले उनकी  याद में स्मृति-दिवस मना रही है. आइये, उनके जीवन और संघर्षों पर एक नज़र डालते हुए बदलाव की लड़ाई में हर संभव योग देने की जिद ठान लें. सुधीर सुमन के साथ राम नरेश जी के जीवन पर एक निगाह )

कॉमरेड राम नरेश राम को लाल सलाम !
सन् 1924 में सहार प्रखंड के एकवारी गांव में एक भूमिहीन दलित परिवार में जन्मे का. रामनरेश राम 18-19 साल की उम्र में ही 1942 के आंदोलन में शामिल हो गए थे। भगतसिंह और उनके साथियों के इंकलाबी विचारों और स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में चले किसान आंदोलन का उनपर गहरा प्रभाव पड़ा था। 1947 में जो आजादी मिली, उससे बहुत सारे क्रांतिकारियों की तरह वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लग रहा था कि आजादी की घोषणा तो हो गई है, पर यह जमींदार और पूंजीपतियों की ही आजादी है और व्यवस्था के जनविरोधी स्वरूप में कोई बदलाव नहीं आया है। एक ओर कांग्रेसी सत्ता की बंदरबाट में लगे हुए थे, तो दूसरी ओर तेलंगाना किसान विद्रोह हो रहा था। 

का. रामनरेश राम तेलंगाना किसान आंदोलन के समर्थन में और क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के फांसी के खिलाफ कम्युनिस्ट आंदोलन में शामिल हुए और देश के करोड़ों शोषित-वंचित-मेहनतकश लोगों के लिए असली आजादी और वास्तविक लोकतंत्र की लड़ाई में आगे बढ़ चले। जनकवि रमाकांत द्विवेदी 'रमता' समेत उस दौर के कई ईमानदार स्वाधीनता सेनानी उनके साथ थे। जब कम्युनिस्ट पार्टी प्रतिबंधित थी, तब का. रामनरेश राम उसमें शामिल हुए और शाहाबाद जिला कमेटी के सदस्य बनाए गए। उन्हें किसान सभा की जिम्मेवारी मिली। 1954 में उन्होंने सोन नहर में पटवन का टैक्स बढ़ा देने के खिलाफ जबर्दस्त आंदोलन संगठित किया।

का. रामनरेश राम के लिए राजनीति जनता के संसाधनों को लूटकर घर भरने का माध्यम नहीं थी। उन्होंने गरीब-मेहनतकश लोगों की आजादी और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए राजनीति की और उसमें अपना पूरा जीवन लगा दिया। जनता के बुनियादी संघर्षों से वे कभी अलग नहीं हुए। उनकी राजनीति की दिशा गरीब, भूमिहीन खेत मजदूर और मेहनतकश किसानों के बुनियादी जनसंघर्षों के अनुसार तय होती रही। 1965 में वे भूस्वामियों के विरोध और साजिशों को धता बताते हुए एक बड़ी जनवादी गोलबंदी के जरिए एकवारी पंचायत के मुखिया बने। भारत के नए लोकतंत्र का हाल यह था कि उनका मुखिया बनना भूस्वामी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। जब 1967 में उन्होंने सीपीएम के उम्मीदवार के बतौर सहार विधानसभा का चुनाव लड़ा तो उन्होंने उनके चुनाव एजेंट जगदीश मास्टर पर जानलेवा हमला किया। 

तब तक नक्सलबाड़ी विद्रोह हो चुका था। चारु मजुमदार के नेतृत्व में  भाकपा (माले) का निर्माण हो चुका था। लेकिन पश्चिम बंगाल में भीषण दमन और बिखराव के कारण पार्टी धक्के का शिकार थी, लेकिन जैसे ही उस विद्रोह की चिंगारी एकवारी पहुंची तो एक शक्तिशाली सामंतवाद विरोधी आंदोलन फूट पड़ा। 1974 में पार्टी का पुनर्गठन हुआ। 1975 तक जगदीश मास्टर, रामेश्वर यादव, शीला, अग्नि, लहरी, बूटन मुसहर और भाकपा (माले) के दूसरे महासचिव का. सुब्रत दत्त भी शहीद हो गए। रामनरेश राम को पुलिस सूंघती फिरती रही और हर मुठभेड़ के बाद उनकी मौत की खामख्याली पालती रही। लेकिन भूमिगत स्थिति में ही भाकपा (माले) को व्यापक जनाधार वाली पार्टी बनाने का उनका अभियान जारी रहा। उन्हीं के नेतृत्व में माले ने खुले मोर्चे आईपीएफ के जरिए चुनाव में शिरकत की शुरुआत की। उस वक्त उन्होंने कम्युनिस्टों की चुनाव में भागीदारी के सवाल पर एक पुस्तिका भी लिखी। इसके पहले ‘भोजपुर के समतल की लड़ाई’ नाम की एक पुस्तिका भी उन्होंने लिखी थी।
का. रामनरेश राम हमेशा संघर्ष के सारे रूपों को मिलाते हुए जनता के संघर्ष को संचालित करते रहे। उनकी राजनीति कभी भी हथियारों या धन की आश्रित नहीं रही, हमेशा उसके केंद्र में जनता और उसकी पहलकदमी रही। जातीय दायरे को तोड़ते हुए उन्होंने गरीबों, खेत-मजदूरों, किसानों, नौजवानों और लोकतंत्रपसंद-न्यायपसंद लोगों का एक व्यापक मोर्चा बनाने की कोशिश की। का. रामनरेश राम ने एक दलित परिवार में जन्म लिया, पर कभी भी दलित-पिछड़ों के नाम पर शासकवर्ग द्वारा संचालित जातिवादी राजनीतिक धाराओं के साथ नहीं गए। उन्होंने जीवन में वर्ग-संघर्ष की राह पकड़ी और हमेशा उस पर कायम रहे। उन्होंने अपने संघर्षों के जरिए बताया कि दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक लोगों की सामाजिक-आर्थिक मुक्ति वर्ग-संघर्ष के ही रास्ते संभव है, उसी के भीतर से निकलकर कुछ लोगों के शासकवर्ग में शामिल हो जाने से मुक्ति संभव नहीं है।

उन्होंने चुनाव को वर्ग-संघर्ष के तौर पर ही लिया। जब 1995 में वे सहार से चुनाव जीत गए, तभी प्रतिक्रिया में शासकवर्ग ने अपने संरक्षण में रणवीर सेना को जन्म दिया। उस वक्त भी अपने अनुभवों को आधार पर उन्होंने कहा कि यह सेना किसी जाति का भी भला नहीं कर सकती, बल्कि जिस जाति के नाम पर बनी है, उसके लिए ही भस्मासुर हो जाएगी। रणवीर सेना ने महिलाओं, बच्चों और वृद्धों तक की हत्या की और भाकपा (माले) को खत्म करने की कोशिश की। लेकिन का. रामनरेश राम के कुशल राजनीतिक निर्देशन में जो चौतरफा लड़ाई लड़ी गई उससे न केवल रणवीर सेना खत्म हुई, बल्कि जिस जाति के नाम पर वह सेना बनी थी, उससे भी वह अलगाव में पड़ गई।

जातीय समीकरण की राजनीति की आड़ में भूस्वामियों, पूंजीपतियों, दबंगों और अपराधियों का हित साधने वाली राजनीतिक पार्टियों के लिए का. रामनरेश राम हमेशा एक चुनौती बने रहे। जब वे अपार जनसमर्थन से विधायक बने तो सत्ता ने उन्हें भूमिगत जमाने से भी ज्यादा खतरनाक समझा। कांग्रेसी राज के पुलिस रिकार्ड में वे मृत घोषित किए जा चुके थे। 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार ने उन पर लादे गए सारे फर्जी मुकदमों को खत्म करने का ऐलान किया था। लेकिन लालू-राबड़ी राज में भी वे मुकदमे खत्म नहीं किए गए, बल्कि नए-नए फर्जी मुकदमे लाद दिए गए। ऐसा ही एक मुकदमा नितीश राज में उनके निधन तक कायम रहा, जबकि पुलिस द्वारा उन्हें उग्रवादी कहे जाने के खिलाफ पूरा विपक्ष उबल पड़ा था। पुलिस ने उन्हें कई बार गिरफ्तार करने की कोशिश की, पर वे कभी उनके हाथ नहीं आए। जैसा माओ ने कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के बारे में कहा था कि जनता के साथ उनका रिश्ता पानी और मछली की तरह होना चाहिए, तो वैसा ही रिश्ता का. रामनरेश राम का भोजपुर की जनता के साथ था। इसी गहरे जुड़ाव के कारण ही उनके खिलाफ की जाने वाली सत्ता और प्रशासन की साजिशें कभी सफल नहीं हो पाईं।

जनता के व्यापक लोकतांत्रिक मुद्दों पर उनके नेतृत्व में भाकपा (माले) ने हमेशा हस्तक्षेप किया। यहां तक कि जब आपातकाल में दूसरी पार्टियों के नेता दमन और गिरफ्तारी से बचने के लिए नेपाल की ओर रुख कर रहे थे, तब सर पर भारी ईनाम के बावजूद वे भोजपुर के गांवों में थे और आपातकाल के खिलाफ उनके साथी गांव-गांव पोस्टर लगा रहे थे। कार्यकर्ता बताते हैं कि उन्होंने शिक्षा और वैचारिक अध्ययन पर भी हमेशा जोर दिया। चुने हुए जनप्रतिनिधि के तौर पर उन्होंने जो भूमिका निभाई, वह किसी भी ईमानदार और जनपक्षधर जनप्रतिनिधि के लिए प्रेरणास्रोत का काम करेगा। आज जबकि मुखिया तक के चुनाव में लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं, तब भी उनके नेतृत्व में एक मुखिया से भी कम खर्च में उनकी पार्टी पूरे जिले में विधान सभा या लोकसभा का चुनाव लड़ती रही। 

जनता का मुखिया या जनता का विधायक कैसा होना चाहिए, का. रामनरेश राम इसके मिसाल थे। विकास योजनाओं में पारदर्शिता और उस पर जननियंत्रण की परंपरा वे हमें दे गए हैं। उन पर कमीशनखोरी या फंड के गबन का आरोप कभी नहीं लगा। उन्होंने सहार विधानसभा के हर गरीब टोले में सामुदायिक भवन और चबूतरे बनवाए। शायद इसके पीछे भी उनकी मंशा सामुदायिकता को मजबूत करना ही था। अनेक ऐसे गांव जो मुख्य सड़कों से कटे हुए उन गावों को मुख्य सड़कों से जोड़ने का काम आजादी के बाद पहली बार उन्होंने किया। विधायक होते हुए भी जनांदोलनों को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। उनके नेतृत्व में सहार की जनता ने सड़क और सोन नद में पुल को लेकर पंद्रह दिनों तक प्रखंड कार्यालय पर अनवरत घेरेबंदी की थी, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने सिंचाई की व्यवस्था को दुरुस्त करने पर खास ध्यान दिया। अपने इलाके में सांप्रदायिक सद्भाव कायम करने में भी उनकी अहम भूमिका रही। केंद्रीय कमेटी और पोलित ब्यरो सदस्य समेत वे भाकपा (माले) की कई उच्चतर जिम्मवारियों में रहे। वे अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा के संस्थापक अध्यक्ष थे। वे माले विधायक दल के नेता भी थे।

सदियों में हासिल जनता के सामूहिक ज्ञान और न्याय के लिए होने वाले संघर्षों और परंपराओं के प्रति उनके भीतर बेहद सम्मान था। उन्होंने 1942 में लसाढ़ी में 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन के दौरान शहीद हुए किसानों की स्मृति में भव्य स्मारक बनवाया। कुंवर सिंह समेत 1857 के महासंग्राम के शहीदों की याद जगदीशपुर में आयोजित ‘बलिदान को सलाम’ कार्य़क्रम के मुख्य उत्प्रेरक वही थे। भगतसिंह की जन्मशती पर आयोजित समारोह में स्वाधीनता सेनानी और भोजपुर किसान आंदोलन के साथी जनकवि रमाकांत रमता द्विवेदी के साथ वे शामिल हुए थे। का. रामनरेश राम सर्वहारा वर्ग की दृढ़ता और उसकी परिवर्तनकारी शक्ति के प्रति आस्था का नाम हैं। भ्रष्टाचार, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, कृषि की बदहाली, किसानों की आत्महत्या, मजदूरों की भुखमरी, महंगाई और बेरोजगारी की वाहक पतनशील राजनीति के इस दौर में वे एक ऐसी क्रांतिकारी जनराजनीतिक परंपरा हमें दे गए हैं, जिन पर भोजपुर ही नहीं, पूरे देश की जनता गर्व कर सकती है और उस राह पर चलते हुए परिवर्तन और इंकलाब की उम्मीदों को नई ऊंचाई दे सकती है।

9/29/11

गुरुशरण जी को जसम की श्रद्धांजलि

  क्रांतिकारी नाट्यकर्मी और 
जन संस्कृति मंच के संस्थापक अध्यक्ष गुरुशरण सिंह नहीं रहे  

28 सितम्बर ,2011. बुधवार. 


संस्कृति की दुनिया में शहीद भगत सिंह की विरासत के वाहक पंजाब के विख्यात रंगकर्मी गुरुशरण सिंह आज नहीं रहे. वे उम्र के 82 साल पूरे कर चुके थे. भगत सिंह उनके सबसे बड़े प्रेरणा-स्रोत थे और उनके जीवन और सन्देश को वे लगातार अपने नाटकों में जीवंत ढंग से प्रस्तुत करते रहे. ये भी अजब संयोग है क़ि उनका निधन आज 28 सितम्बर को हुआ जो शहीद-ए-आज़म का जन्मदिवस है. आज चंडीगढ़ में उनका निधन हुआ और दोपहर बाद उनकी अंत्येष्टि संपन्न हुई. उनकी अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में आम नागरिक और संस्कृतिकर्मी शामिल थे. शोक सभा इतवार को होगी. परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटियाँ हैं.

महज १६ साल की उम्र में गुरुशरण सिंह ने कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और ता-उम्र कम्यूनिस्ट उसूलों पर कायम रहे. आज फोन पर जन संस्कृति मंच के साथियों से बात करते हुए गुरुशरण जी की बड़ी बेटी ने गर्व के साथ कहा क़ि उन्हें इस बात का हमेशा गर्व रहेगा क़ि उनके पिता ने कभी भी किसी सरकार के साथ कोइ समझौता नहीं किया, अपने उसूलों से कभी पीछे नहीं हटे. रसायन शास्त्र से एम.एस.सी. करने के उपरांत वे पंजाब सरकार के सिंचाई विभाग में रिसर्च आफिसर के पद पर नियुक्त हुए. इस पद पर रहते हुए उन्होंने भाखड़ा नांगल बाँध और दूसरी महत्वपूर्ण परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 

यहीं काम करते हुए उन्होंने 1956 से अपनी क्रांतिकारी नाट्य-यात्रा शुरू की. जब वे नाटक करते तो उसमें बेटियों सहित उनका पूरा परिवार भाग लेता. देश-विदेश में उन्होंने हज़ारों प्रस्तुतियां कीं. बगैर साजो-सामान के जनता के बीच गावों, मुहल्लों, चौराहों और सडकों पर मामूली संसाधनों के साथ नाटक करना उनकी नाट्य-शैली का अभिन्न अंग था.सामंती शोषण, पूंजीवादी लूट और दमन तथा साम्राज्यवाद के विरोध में जन-जागरण इन नाटकों का मुख्य उद्देश्य होता. तमाम समसामयिक घटनाओं के सन्दर्भ भी मूलतः इन्हीं केन्द्रीय उद्देश्यों की पूर्ती के लिए उनके नाटकों में नियोजित रहते थे. 

गुरुशरण सिंह ने जनता के रंगमंच, आन्दोलनकारी और प्रयोगधर्मी थियेटर, ग्रामीण रंगमंच का पंजाब में उसी तरह विकास किया जैसा क़ि बादल सरकार ने बंगाल में. यह एक अखिल भारतीय प्रक्रिया थी जो देश में आमूलचूल बदलाव के लिए चल रहे जन-संघर्षों के साथ संस्कृतिकर्मियों द्वारा कंधे से कंधा मिलाकर चलने के संकल्प से उपजी थी. जिस तरह बादल सरकार मूल कर्मभूमि बंगाल होने के बावजूद कभी बंगाल तक सीमित नहीं रहे, वैसे ही गुरुशरण सिंह भी कभी पंजाब तक महदूद नहीं रहे. यही कारण था क़ि प्रधानतः हिंदी-उर्दू क्षेत्र के संगठन जन संस्कृति मंच के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और वे दिल्ली में अक्टूबर 1985 में सम्पन्न हुए उसके स्थापना सम्मलेन में संस्थापक अध्यक्ष बनाए गए. क्रांतिकारी कवि गोरख पाण्डेय महासचिव चुने गए. 

गुरुशरण सिंह और अवतार सिंह 'पाश' ऐसे क्रांतिकारी संस्कृतिकर्मी थे जिन्होनें 1980 के दशक में अलगाववादी आन्दोलन में सुलगते पंजाब में पूरी निर्भीकता के साथ गाँव- गाँव जाकर भगत सिंह के सपनों , भारतीय क्रान्ति की ज़रुरत, समाजवाद की ज़रुरत, सामंती शोषण और साम्राज्यवाद के विरोध की आवाज़ को बुलंद किया. 'पाश' इसी प्रक्रिया में शहीद हुए.

गुरुशरण जी ने राजनीति में सक्रिय भूमिका से भी कभी गुरेज़ नहीं किया. 'पंजाब लोक सभ्याचार मंच' और 'इंकलाबी मंच ,पंजाब' के तो वे संस्थापक ही थे. इंडियन पीपुल्स फ्रंट की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के सदस्य रहे. भाकपा (माले) के बहुत करीबी हमदर्द रहे और लगातार उसके कार्यक्रमों में सरगर्मी से शिरकत करते रहे. वे सांस्कृतिक मोर्चे पर भी महज कलाकार नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण और समर्पित संस्कृतिकर्मी की भूमिका में रहे. अपने अभिन्न मित्र बलराज साहनी की याद में उन्होनें 'बलराज साहनी यादगार प्रकाशन' की स्थापना कर सैकड़ों छोटी-बड़ी किताबों का प्रकाशन किया जिनकी कीमत बहुत ही कम हुआ करती थी. इन किताबों को वे अक्सर खुद अपने झोले से निकाल कर बेचा भी करते थे. उनके लिए कोइ काम छोटा या बड़ा नहीं था.

लम्बे समय से बीमार रहने के बावजूद गुरुशरण जी सदैव राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से सजग और अपने उद्देश्यों के लिए सचेष्ट रहे. पंजाबी और हिन्दी में उनके ढेरों नाटक जनता की स्मृति में अमर रहेंगे. 'इन्कलाब जिंदाबाद' या 'जन्गीराम की हवेली' जैसे उनके नाटक हिन्दी दर्शक भी कभी भूल नहीं सकते.

वे अपने सम्पूर्ण जीवन और संस्कृति-कर्म में जनवादी, खुशहाल और आज़ाद भारत के जिस सपने को साकार करने के लिए जूझते रहे, उसे ज़िंदा रखने और पूरा करने का संकल्प दोहराते हुए हम अपनी सांस्कृतिक धारा के जुझारू प्रतीक का. गुरुशरण सिंह को जन संस्कृति मंच की और से लाल सलाम पेश करते हैं.

(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )

9/27/11

संगीतकार और कवि- 2

  भीमसेन जोशी, अली अकबर खान और मंगलेश डबराल   


(4 फरवरी , 1922 - 24, जनवरी  2011)



















वैसे तो कलाओं के आपसी समबन्धों पर बात करने वाले  आलिमों की कोई कमी नहीं, पर कभी आपको मौक़ा मिले तो इनको महसूस करिए. ये एक अद्भुत दुनिया है, जहां दो अपने-अपने फन के माहिर लोग एक दूसरे के गहरे रियाज, समझ और श्रम को सलाम पेश करते हैं. इस लिहाज से संगीत और कविता का अजुगत-अद्भुत नाता है.  शास्त्रीय संगीत से लेकर ग़ज़ल और कव्वाली गायकी तक ये सिलसिला पसरा है. इस श्रृंखला में मैं अपनी पसंद के कुछ फनकारों की आवाजाही को सामने रखने का जतन करूंगा. 

संगीतकार और कवि श्रृंखला में आज पेश है पंडित भीमसेन जोशी का गाया हुआ राग दुर्गा. इसको सुनते हुए हमारे समय के अद्भुत कवि मंगलेश जी ने एक कविता लिखी थी. कविता सिद्धांत के ब्लॉग बुद्धू-बक्सा पर दिखी तो याद आयी. सो आज वही कविता और जोशी जी की आवाज़ में राग दुर्गा. साथ ही सुनिए राग दुर्गा का एक नया रंग, उस्ताद अली अकबर खान के तारों से. अभी बहुत दिन नहीं हुए जब ये दोनों उस्ताद सशरीर हमारे बीच होते थे. उनकी याद का भी एक सुर इस प्रस्तुति का भाग हो, सोच यही रहा हूँ...


   राग दुर्गा  
 (भीमसेन जोशी के गाये इस राग को सुनने की एक स्मृति) 

  मंगलेश डबराल 

एक रास्ता उस सभ्यता तक जाता था
जगह-जगह चमकते दिखते थे उसके पत्थर
जंगल में घास काटती स्त्रियों के गीत पानी की तरह
बहकर आ रहे थे
किसी चट्टान के नीचे बैठी चिड़िया
अचानक अपनी आवाज़ से चौंका जाती थी
दूर कोई लड़का बांसुरी पर बजाता था वैसे ही स्वर
एक पेड़ कोने में सिहरता खड़ा था
कमरे में थे मेरे पिता
अपनी युवावस्था में गाते सखि मोरी रूम-झूम
कहते इसे गाने से जल्दी बढ़ती है घास

सरलता से व्यक्त होता रहा एक कठिन जीवन
वहाँ छोटे-छोटे आकार थे
बच्चों के बनाए हुए खेल-खिलौने घर-द्वार
आँखों जैसी खिड़कियाँ
मैंने उनके भीतर जाने की कोशिश की
देर तक उस संगीत में खोजता रहा कुछ
जैसे वह संगीत भी कुछ खोजता था अपने से बाहर
किसी को पुकारता किसी आलिंगन के लिए बढ़ता
बीच-बीच में घुमड़ता उठता था हारमोनियम
तबले के भीतर से आती थी पृथ्वी की आवाज़

वह राग दुर्गा थे यह मुझे बाद में पता चला
जब सब कुछ कठोर था और सरलता नहीं थी
जब आखिरी पेड़ भी ओझल होने को था
और मैं जगह-जगह भटकता था सोचता हुआ वह क्या था
जिसकी याद नहीं आयी
जिसके न होने की पीड़ा नहीं हुई
तभी सुनाई दिया मुझे राग दुर्गा
सभ्यता के अवशेष की तरह तैरता हुआ
मैं बढ़ा उसकी ओर
उसका आरोह घास की तरह उठता जाता था
अवरोह बहता आता था पानी की तरह.


9/25/11

संतो ! सहज समाधि भली... प्रणय कृष्ण

सम्मान के बहाने अमरकांत जी के रचना-कर्म पर एक टीप -प्रणय कृष्ण 

 सादगी बड़ी कठिन साधना है. अमरकांत का व्यक्तित्व और कृतित्व, दोनों ही इसका प्रमाण है. अमरकांत के जीवन संघर्ष को कोइ अलग से न जाने, तो उनके सहज, आत्मीय और स्नेहिल व्यवहार से शायद ही कभी समझ पाए की इस सहजता को कितने अभावों, बीमारियों, उपेक्षाओं और दगाबाजियों के बीच साधा गया है. आत्मसम्मान हो तो आत्मसम्मोहन, आत्मश्लाघा और आत्मप्रदर्शन की ज़रुरत नहीं पड़ती. मुझे लगता है की 16 साल की उम्र में बलिया के जिस बालक ने कालेज छोड़ जे. पी.- लोहिया- नरेन्द्रदेव के नेतृत्व वाले 'भारत छोडो आन्दोलन' में कूद पड़ने का निर्णय लिया था, वह बालक अभी भी अमरकांत में ज़िंदा है.

जिस रचनाकार की 2-3 कहानियां भी दुनिया के किसी भी महान कथाकार के समकक्ष उसे खडा करने में समर्थ हैं, ('दोपहर का भोजन', 'डिप्टी कलक्टरी ', ज़िन्दगी और जोंक' या कोई चाहे तो अन्य कहानियां भी चुन सकता है), उसे उपेक्षा की मार पड़ती ही रही. ये उनके छोटे बेटे अरविन्द और बहू रीता का ही बूता था कि अपनी स्वतंत्र ज़िंदगी छोड़ उन्होंने हिन्दी समाज के इस अप्रतिम कथाकार को हमारे बीच भौतिक रूप से बनाए और बचाए रखा है. अमरकांत भारतीय जीवन की विदूपताओं, उसकी घृणास्पद तफसीलों में बगैर किसी अमूर्तन का सहारा लिए अपनी ठेठ निगाह जितनी देर तक टिका सकते हैं, उतना शायद ही कोइ अन्य प्रेमचंदोत्तर कथाकार कर पाया हो. उनका कथाकार भीषण रूप से अमानवीय होती गयी स्वातंत्र्योत्तर भारत की परिस्थितियों के बीच बगैर भावुक हुए, बगैर किसी हाहाकार का हिस्सा बने पशुवत जीवन जीने को अभिशप्त किरदारों के भीतर भी इंसानियत की चमक को उभार देता है. अमरकांत साबित कर देते हैं कि इसके लिए किन्ही बड़े आदर्शों का चक्कर लगाना ज़रूरी नहीं, बल्कि जीवन खुद ऐसा ही है. जीवन से ज़्यादा विश्वसनीय कुछ और नहीं. 

'ज़िंदगी और जोंक' का रजुआ एक असंभव सा पात्र है लेकिन पूरी तरह विश्वसनीय. हम आप भी रजुआ को जीवन में देखे हुए हैं, लेकिन उसके जीवन और चरित्र की जटिलताओं में जब हम अमरकांत की लेखनी की मार्फ़त प्रवेश करते हैं, तब हमारे सामने एक असंभव सा जीवन प्रत्यक्ष होता है, मानवता के सीमान्त पर बसर की जा रही ज़िंदगी सहसा हमारे बोध में दाखिल होती है. विश्वनाथ त्रिपाठी ने ठीक ही लिखा है कि अमरकांत 'कफ़न' की परम्परा के रचनाकार हैं. 'ज़िंदगी और जोंक' के रजुआ का 'करुण काइयांपन' घीसू-माधो के काइएपन की ही तरह उसकी असहायता की उपज है. ये कहानी उस अर्द्ध औपनिवेशिक और मज़बूत सामंती अवशेषों वाले भारतीय पूंजीवादी व्यवस्था पर चोट है जिसने गरीब आदमी को पशुता के स्तर पर जीने को मजबूर कर रखा है, जिसका ज़िंदा बचा रहना ही उसकी उपलब्धि है, जिसकी जिजीविषा ने ही उसे थेथर बना दिया है, जिसका इस समाज में होना ही व्यवस्था पर करारा व्यंग्य भी है और उसकी अमानवीयता का सूचकांक भी.

अमरकांत विडम्बनाओं और विसंगतियों को जिस भेदक व्यंग्य के साथ प्रकट करते हैं, वह दुर्लभ है. वे जिस बहुविध द्वंद्वों से घिरे समाज के कथाकार हैं, उसकी जटिल टकराहटों में निर्मित किरदारों और जीवन व्यापार को वे ऐसी सहजता से पेश करते हैं कि कोइ धोखा खा जाए.पशु-बिम्बों में अंकित अनगिनत मानवीय भंगिमाएँ, कहानियों की निरायास प्रतीकात्मकता, माहौल को सीधे संवेद्य बनाने वाली बिलकुल सामान्य जीवन-व्यवहार से ली गईं नित नूतन उपमाएं, जनपदीय मुहावरों और कथन -भंगिमाओं से भरी, सहज और खरी चलती हुई ज़बान, अद्भुत सामाजिक संवेदनशीलता और मनोवैज्ञानिक गहराई से बुने गए तमाम दमित तबकों से खड़े किए गए उनके अविस्मर्णीय चरित्र, समाज और दुनिया को आगे ले जानेवाली बातों और भाव-संरचनाओं का गहरा विवेक उनके कथाकार की विशेषता है. रजुआ, मुनरी, मूस, सकलदीप बाबू , 'इन्हीं हथियारों से' की बाल-वेश्या ढेला, सुन्नर पांडे की पतोह, 'हत्यारे ' कहानी के दो नौजवान, बऊरईया कोदो खानेवाला गदहा जैसे अनगिनत अविस्मर्णीय और विश्वसनीय किरदारों के ज़रिए अमरकांत ने हमारे समाज की हजारहा विडंबनाओं को जिस तरह मूर्त किया है, वह सरलता के जटिल सौन्दर्यशास्त्र का प्रतिमान है. उत्तरवादी और अन्तवादी घोषणाओं के नव-साम्राज्यवादी दौर में भी अमरकांत के यथार्थवाद को विकल्पहीनता कभी क्षतिग्रस्त न कर सकी. इसका प्रमाण है 2003 में प्रकाशित उनका उपन्यास 'इन्हीं हथियारों से' जो सन 1942  के 'भारत छोडो आन्दोलन' की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है.

प्रगतिशील आन्दोलन के 75 वें साल में अमरकांत को यह सम्मान मिलना एक सुखद संयोग है. ज्ञानपीठ से सम्मानित हिंदी के अन्य मूर्धन्य साहित्यकारों का प्रगतिशील आन्दोलन से वैसा जीवन भर का सम्बन्ध नहीं रहा जैसा की अमरकांत का. अमरकांत को जितने सम्मान, पुरस्कार मिले हैं, उनकी कुल राशि से ज़्यादा उनके जैसे व्यापक रूप से पढ़े जाने वाले लेखक की रायल्टी बनती थी, जिसे देना उनके प्रकाशकों को गवारा न हुआ. पिछले 15 सालों से हमने अमरकांत को कम से कम तीन किराए के मकानों में देखा है. दो कमरों से ज़्यादा का घर शायद ही उन्हें मयस्सर हुआ हो.

'इन्ही हथियारों से' का एक अदना सा पात्र कहता है," बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े सिद्धान्त सिर्फ व्यवहार से ही सार्थक और सहज हो सकते हैं, जिसके बिना जीवन से ही रस खींचकर गढ़े हुए सिद्धान्त,जीवन से अलग होकर बौने और नाकाम हो जाते हैं." अमरकांत का जीवन और रचना-कर्म खुद इस की तस्दीक करता है. काश ! हिन्दी के प्रतिष्ठान चलाने लोग अमरकांत होने के इस अर्थ को समझ पाते !

9/22/11

संगीतकार और कवि- 1

  कुमार गन्धर्व और सर्वेश्वर  

पंडित कुमार गन्धर्व की गायकी हमेशा ही एक अद्भुत बेचैनी से पुर होती है. ग़ालिब याद आ गए कि 'पुर हूँ शिकवे से, राग से जैसे बाजा'. ये 'शिकवा' कुमार साहब के यहाँ उनके प्रिय कवि कबीर से सुर मिलाता आता है. यह कोई आसान काम नहीं, इसकी शर्त है 'दुनिया से यारी' वा 'दुनियादारी' का त्याग. माने यह कहने का साहस कि 'हमन है इश्क मस्ताना, हमन दुनिया से यारी क्या'.

विष्णु चिंचालकर द्वारा बनाया भावचित्र, आभार- श्री सुनील मुखी 




















कुमार साहब के गायन में डूबने के लिए
आइये एक कविता की साखी लेते चलें.
कविता सर्वेश्वर की है.

  सु रों के स हा रे-२  
  कुमार गन्धर्व का गायन सुनते हुए  

दूर-दूर तक
सोई पडी थीं पहाड़ियां
अचानक टीले करवट बदलने लगे
जैसे नींद में उठ चलने लगे.

एक अदृश्य विराट हाथ बादलों-सा बढ़ा
पत्थरों को निचोड़ने लगा
निर्झर फूट पड़े
फिर घूमकर सब कुछ रेगिस्तान में
बदल गया.

शांत धरती से
अचानक आकाश चूमते
धूल भरे बवंडर उठे
फिर रंगीन किरणों में बदल
धरती पर बरस कर शांत हो गए.

तभी किसी
बांस के बन में आग लग गयी
पीली लपटें उठने लगीं,
फिर धीरे-धीरे हरी होकर
पत्तियों से लिपट गयीं.

पूरा वन असंख्य बांसुरियों में बज उठा,
पत्तियाँ नाच-नाचकर
पेड़ों से अलग हो
हरे तोते बन कर उड़ गयीं.

लेकिन भीतर कहीं बहुत गहरे
शाखों में फंसा
बेचैन छटपटाता रहा
एक बारहसिंहा.

सारा जंगल कांपता हिलता रहा

लो वह मुक्त हो
चौकड़ी भरता
शून्य में विलीन हो गया
जो धमनियों से
अनंत तक फैला हुआ है.


1. राग भैरव -रवि के करम है रे  
2. राग  शिवमत भैरव -अरी ए री माल  
3. राग  भावमत भैरव- कंथा रे  जानू रे  जानू   

9/13/11

रमाशंकर यादव 'विद्रोही' की तीन कवितायें

मकबूल फ़िदा हुसैन की पेंटिंग, शीर्षक- रेप ऑफ़ इंडिया
















 


औरतें

कुछ औरतों ने
अपनी इच्छा से
कुएं में कूदकर जान दी थी,
ऐसा पुलिस के रिकार्डों में दर्ज है।
और कुछ औरतें
चिता में जलकर मरी थीं,
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा है।

मैं कवि हूं,
कर्ता हूं,
क्या जल्दी है,
मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित,
दोनों को एक ही साथ
औरतों की अदालत में तलब करूंगा,
और बीच की सारी अदालतों को
मंसूख कर दूंगा।

मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूंगा,
जिन्हें श्रीमानों ने
औरतों और बच्चों के खिलाफ पेश किया है।
मैं उन डिग्रियों को निरस्त कर दूंगा,
जिन्हें लेकर फौजें और तुलबा चलते हैं।
मैं उन वसीयतों को खारिज कर दूंगा,
जिन्हें दुर्बल ने भुजबल के नाम किया हुआ है।

मैं उन औरतों को जो
कुएं में कूदकर या चिता में जलकर मरी हैं,
फिर से जिंदा करूंगा,
और उनके बयानों को
दुबारा कलमबंद करूंगा,
कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया!
कि कहीं कुछ बाकी तो नहीं रह गया!
कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई!

क्योंकि मैं उस औरत के बारे में जानता हूँ
जो अपने एक बित्ते के आंगन में
अपनी सात बित्ते की देह को
ता-जिंदगी समोए रही और
कभी भूलकर बाहर की तरफ झांका भी नहीं।
और जब वह बाहर निकली तो
औरत नहीं, उसकी लाश निकली।
जो खुले में पसर गयी है,
या मेदिनी की तरह।

एक औरत की लाश धरती माता
की तरह होती है दोस्तों!
जे खुले में फैल जाती है,
थानों से लेकर अदालतों तक।
मैं देख रहा हूं कि
जुल्म के सारे सबूतों को मिटाया जा रहा है।
चंदन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित,
और तमगों से लैस सीनों को फुलाए हुए सैनिक,
महाराज की जय बोल रहे हैं।
वे महाराज की जय बोल रहे हैं।
वे महाराज जो मर चुके हैं,
और महारानियां सती होने की तैयारियां कर रही हैं।
और जब महारानियां नहीं रहेंगी,
तो नौकरानियां क्या करेंगी?
इसलिए वे भी तैयारियां कर रही हैं।

मुझे महारानियों से ज्यादा चिंता
नौकरानियों की होती है,
जिनके पति जिंदा हैं और
बेचारे रो रहे हैं।
कितना खराब लगता है एक औरत को
अपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना,
जबकि मर्दों को
रोती हुई औरतों को मारना भी
खराब नहीं लगता।
औरतें रोती जाती हैं,
मरद मारते जाते हैं।
औरतें और जोर से रोती हैं,
मरद और जोर से मारते हैं।
औरतें खूब जोर से रोती हैं,
मरद इतने जोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं।

इतिहास में वह पहली औरत कौन थी,
जिसे सबसे पहले जलाया गया,
मैं नहीं जानता,
लेकिन जो भी रही होगी,
मेरी मां रही होगी।
लेकिन मेरी चिंता यह है कि
भविष्य में वह आखिरी औरत कौन होगी,
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा,
मैं नहीं जानता,
लेकिन जो भी होगी
मेरी बेटी होगी,
और मैं ये नहीं होने दूंगा।





















नानी

कविता नहीं कहानी है,
और ये दुनिया सबकी नानी है,
और नानी के आगे ननिहाल का वर्णन अच्छा नहीं लगता।

मुझे अपने ननिहाल की बड़ी याद आती है,
आपको भी आती होगी!
एक अंधेरी कोठी में
एक गोरी सी बूढ़ी औरत,
रातो-दिन जलती रहती है चिराग की तरह,
मेरे खयालों में।
मेरे जेहन में मेरी नानी की तसवीर कुछ इस तरह से उभरती है
जैसे कि बाजरे के बाल पर गौरैया बैठी हो।
और मेरी नानी की आंखे...
उमड़ते हुए समंदर सी लहराती हुई उन आंखों में,
आज भी आपाद मस्तक डूब जाता हूं आधी रात को दोस्तों!

और उन आंखों की कोर पर लगा हुआ काजल,
लगता था कि जैसे क्षितिज छोर पर बादल घुमड़ रहे हों।
और मेरी नानी की नाक,
नाक नहीं पीसा की मीनार थी,
और मुंह, मुंह की मत पूछो,
मुंह की तारे थी मेरी नानी,
और जब चीख कर डांटती थीं,
तो जमीन इंजन की तरह हांफने लगती थी।
जिसकी आंच में आसमान का लोहा पिघलता था,
सूरज की देह गरमाती थी,
दिन धूप लगती थी,
और रात को जूड़ी आती थी।

और गला, द्वितीया के चंद्रमा की तरह,
मेरी नानी का गला पता ही नहीं चलता था,
कि हंसुली में फंसा है या हसुली गले में फंसी है।
लगता था कि गला, गला नहीं,
विधाता ने समंदर में सेतु बांध दिया है।

और मेरी नानी की देह, देह नहीं आर्मीनिया की गांठ थी,
पामीर के पठार की तरह समतल पीठ वाली मेरी नानी,
जब कोई चीज उठाने के लिए जमीन पर झुकती थीं,
तो लगता था जैसे बाल्कन झील में काकेसस की पहाड़ी झुक गई हो!
बिलकुल इस्कीमों बालक की तह लगती थी मेरी नानी।
और जब घर से निकलती थीं,
तो लगता था जैसे हिमालय से गंगा निकल रही हो!

एक आदिम निरंतरता
जे अनादि से अनंत की और उन्मुख हो।
सिर पर दही की डलिया उठाये,
जब दोनों हाथों को झुलाती हुई चलती थी,
तो लगता था जैसे सिर पर दुनिया उठाये हुए जा रही हो।
जिसमें मेरे पुरखों का भविष्य छिपा हो,
और मेरा जी करे कि मैं पूछूं,
कि ओ री बुढि़या, तू क्या है,
आदमी कि आदमी का पेड़!

पेड़ थी दोस्तों, मेरी नानी आदमियत की,
जिसका कि मैं एक पत्ता हूं।
मेरी नानी मरी नहीं है,
वह मोहनजोदड़ो के तालाब में स्नान को गई है,
और अपनी धोती को उसकी आखिरी सीढ़ी पर सुखा रही है।
उसकी कुंजी यहीं कहीं खो गई है,
और वह उसे बड़ी बेसब्री के साथ खोज रही है।
मैं देखता हूं कि मेरी नानी हिमालय पर मूंग दल रही है,
और अपनी गाय को एवरेस्ट के खूंटे से बांधे हुए है।
मैं खुशी में तालियां बजाना चाहता हूं,
लेकिन यह क्या!!
मेरी हथेलियों पर सरसों उग आई है,
मैं उसे पुकारना चाहता हूं,
लेकिन मेरे होठों पर दही जम गई है,
मैं पाता हूं
कि मेरी नानी दही की नदी में बही जा रही है।
मैं उसे पकड़ना चाहता हूं,
पकड़ नहीं पाता हूं,
मैं उसे बुलाना चाहता हूँ,
लेकिन बुला नहीं पाता हूं,
और मेरी देह, मेरी समूची देह,
एक पत्ते की तरह थर-थर कांपने लगती है,
जो कि अब गिरा कि तब गिरा।
























 गुलाम

1.
वो तो देवयानी का ही मर्तबा था,
कि सह लिया सांच की आंच,
वरना बहुत लंबी नाक थी ययाति की।
नाक में नासूर है और नाक की फुफकार है,
नाक विद्रोही की भी शमशीर है, तलवार है।
जज़्बात कुछ ऐसा, कि बस सातों समंदर पार है,
ये सर नहीं गुंबद है कोई, पीसा की मीनार है।
और ये गिरे तो आदमीयत का मकीदा गिर पड़ेगा,
ये गिरा तो बलंदियों का पेंदा गिर पड़ेगा,
ये गिरा तो मोहब्बत का घरौंदा गिर पड़ेगा,
इश्क  और हुश्न  का दोनों की दीदा गिर पड़ेगा।
इसलिए रहता हूं जिंदा
वरना कबका मर चुका हूं,
मैं सिर्फ काशी में ही नहीं रूमान में भी बिक चुका हूं।

हर जगह ऐसी ही जिल्लत,
हर जगह ऐसी ही जहालत,
हर जगह पर है पुलिस,
और हर जगह है अदालत।
हर जगह पर है पुरोहित,
हर जगह नरमेध है,
हर जगह कमजोर मारा जा रहा है, खेद है।
सूलियां ही हर जगह हैं, निज़ामों की निशान,
हर जगह पर फांसियां लटकाये जाते हैं गुलाम।
हर जगह औरतों को मारा-पीटा जा रहा है,
जिंदा जलाया जा रहा है,
खोदा-गाड़ा जा रहा है।
हर जगह पर खून है और हर जगह आंसू बिछे हैं,
ये कलम है, सरहदों के पार भी नगमे लिखे हैं।

2.
आपको बतलाऊं मैं इतिहास की शुरुआत को,
और किसलिए बारात दरवाजे पर आई रात को,
और ले गई दुल्हन उठाकर
और मंडप को गिराकर,
एक दुल्हन के लिए आये कई दूल्हे मिलाकर।
और जंग कुछ ऐसा मचाया कि तंग दुनिया हो गई,
और मरने वाले की चिता पर जिंदा औरत सो गई।
और तब बजे घडि़याल,
पड़े शंख-घंटे घनघनाये,
फौजों ने भोंपू बजाये, पुलिस भी तुरही बजाये।
मंत्रोच्चारण यूं हुआ कि मंगल में औरत रचती हो,
जीते जी जलती रहे जिस भी औरत के पति हो।

3.
तब बने बाज़ार और बाज़ार में सामान आये,
और बाद में सामान की गिनती में खुल्ला बिकते थे गुलाम,
सीरिया और काहिरा में पट्टा होते थे गुलाम,
वेतलहम-येरूशलम में गिरवी होते थे गुलाम,
रोम में और कापुआ में रेहन होते थे गुलाम,
मंचूरिया-शंघाई में नीलाम होते थे गुलाम,
मगध-कोशल-काशी में बेनामी होते थे गुलाम,
और सारी दुनिया में किराए पर उठते गुलाम,
पर वाह रे मेरा जमाना और वाह रे भगवा हुकूमत!
अब सरे बाजार में ख़ैरात बंटते हैं गुलाम।

लोग कहते हैं कि लोगों पहले ऐसा न था,
पर मैं तो कहता हूं कि लोगों कब, कहां, कैसा न था ?
दुनिया के बाजार में सबसे पहले क्या बिका था ?
तो सबसे पहले दोस्तों .... बंदर का बच्चा बिका था।
और बाद में तो डार्विन ने सिद्ध बिल्कुल कर दिया,
वो जो था बंदर का बच्चा,
बंदर नहीं वो आदमी था।

8/31/11

गोरख पाण्डेय की याद में- 2



 ग़ज़ल -1

कैसे अपने दिल को मनाऊं मैं कैसे कह दूं तुझसे कि प्यार है
तू सितम की अपनी मिसाल है तेरी जीत में मेरी हार है

तू तो बांध रखने का आदी है मेरी सांस-सांस आजादी है
मैं जमीं से उठता वो नगमा हूं जो हवाओं में अब शुमार है

मेरे कस्बे पर, मेरी उम्र पर, मेरे शीशे पर, मेरे ख्वाब पर
यूं जो पर्त-पर्त है जम गया किन्हीं फाइलों का गुबार है

इस गहरे होते अंधेरे में मुझे दूर से जो बुला रही
वो हंसीं सितारों के जादू से भरी झिलमिलाती कतार है

ये रगों में दौड़ के थम गया अब उमड़ने वाला है आंख से
ये लहू है जुल्म के मारों का या फिर इन्कलाब का ज्वार है

वो जगह जहां पे दिमाग से दिलों तक है खंजर उतर गया
वो है बस्ती यारों खुदाओं की वहां इंसां हरदम शिकार है

कहीं स्याहियां, कहीं रौशनी, कहीं दोजखें, कहीं जन्नतें
तेरे दोहरे आलम के लिए मेरे पास सिर्फ नकार है

ग़ज़ल -2

सुनना मेरी दास्तां अब तो जिगर के पास हो
तेरे लिए मैं क्या करूं तुम भी तो इतने उदास हो

कहते हैं रहिए खमोश ही, चैन से जीना सीखिये
चाहे शहर हो जल रहा चाहे बगल में लाश हो

नगमों से खतरा है बढ़ रहा लागू करों पाबंदियां
इससे भी काम न बन सके तो इंतजाम और ख़ास हो

खूं का पसीना हम करें वो फिर जमाएं महफ़िलें
उनके लिए तो जाम हो हमको तड़पती आस हो

जंग के सामां बढ़ाइए खूब कबूतर उड़ाइये
पंखों से मौत बरसेगी लहरों की जलती घास हो

धरती, समंदर, आस्मां, राहें जिधर चलें खुली
गम भी मिटाने की राह है सचमुच अगर तलाश हो

हाथों से जितना जुदा रहें उतने खयाल ही ठीक हैं
वर्ना बदलना चाहोगे मंजर-ए-बद हवास हो

 है कम नहीं खराबियां फिर भी सनम दुआ करो
मरने की तुमपे ही चाह हो जीने की सबको आस हो


आशा का गीत

आएंगे, अच्छे दिन आएंगे,
गर्दिश के दिन ये कट जाएंगे,
सूरज झोपडि़यों में चमकेगा,
बच्चे सब दूध में नहाएंगे।

जालिम के पुर्जे उड़ जाएंगे,
मिल-जुल के प्यार सभी गाएंगे,
मेहनत के फूल उगाने वाले,   
दुनिया के मालिक बन जाएंगे।

दुख की रेखाएं मिट जाएंगी,
खुशियों के होंठ मुस्कुराएंगे,
सपनों की सतरंगी डोरी पर,
मुक्ति के फरहरे लहराएंगे।


अमीरों का कोरस

जो हैं गरीब उनकी जरूरतें कम हैं
कम हैं जरूरतें तो मुसीबतें कम हैं
हम मिल-जुल के गाते गरीबों की महिमा
हम महज अमीरों के तो गम ही गम हैं।

वे नंगे रहते हैं बड़े मजे में
वे भूखों रह लेते हैं बड़े मजे में
हमको कपड़ों पर और चाहिए कपड़े
खाते-खाते अपनी नाकों में दम है।

वे कभी कभी कानून भंग करते हैं
पर भले लोग हैं, ईश्वर से डरते हैं
जिसमें श्रद्धा या निष्ठा नहीं बची है
वह पशुओं से भी नीचा और अधम है।

 अपनी श्रद्धा भी धर्म चलाने में है
अपनी निष्ठा तो लाभ कमाने में है
ईश्वर है तो शांति, व्यवस्था भी है
ईश्वर से कम कुछ भी विध्वंस परम है।

करते हैं त्याग गरीब स्वर्ग जाएंगे
मिट्टी के तन से मुक्ति वहीं पाएंगे
हम जो अमीर है सुविधा के बंदी हैं
लालच से अपने बंधे हरेक कदम हैं।

इतने दुख में हम जीते जैसे-तैसे
हम नहीं चाहते गरीब हों हम जैसे
लालच न करें, हिंसा पर कभी न उतरें
हिंसा करनी हो तो दंगे क्या कम हैं।

जो गरीब हैं उनकी जरूरतें कम हैं
कम हैं मुसीबतें, अमन चैन हरदम है
हम मिल-जुल के गाते गरीबों की महिमा
हम महज अमीरों के तो गम ही गम हैं।





 गोरख पाण्डेय (1945 -1989) प्रतिबद्ध कवि और दर्शन, संस्कृति व कला के प्रश्नों से जूझने वाले हिन्दी के आर्गेनिक इंटलेक्चुअल (जन बुद्धिजीवी). जन संस्कृति मंच के संस्थापक महासचिव.

8/28/11

यह जनता की जीत है- प्रणय कृष्ण

(भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन पर प्रणय कृष्ण की लेखमाला की आख़िरी किस्त)

यह जनता की जीत है- प्रणय कृष्ण


It is not enough to be electors only. It is necessary to be law-makers; otherwise those who can be law-makers will be the masters of those who can only be electors." -Dr.Ambedkar      
( "महज मतदाता होना पर्याप्त नहीं है. कानून-निर्माता होना ज़रूरी है, अन्यथा जो लोग कानून-निर्माता हो सकते हैं, वे उन लोगों के मालिक बन बैठेंगें जो कि महज चुननेवाले हो सकते हैं." -डा. अम्बेडकर)

अन्ना ने आज अनशन तोड़ दिया... चुननेवालों ने कानून-निर्माताओं को बता दिया कि न तो वे सदा के लिए महज चुननेवाले बने रहेंगे और न ही कानून-निर्माताओं को अपना मालिक बनने देंगे. सिटिज़न  चार्टर, प्रदेशों  में  लोकायुक्त  की  नियुक्ति  का  प्रावधान  और  निचली  ब्यूरोक्रेसी  की  जांच, निरीक्षण और सज़ा को लोकपाल के दायरे में लाने की बात सिद्धांत रूप में संसद ने मानकर एक हद तक अपनी इज़्ज़त बचाई है. वोट अगर 184 के तहत होता, तो इनके लिए इज़्ज़त बचाना और भी  मुश्किल होता. साफ़ पता चल जाता कि कौन कहां है. क्रास-वोटिंग भी होती. शायद खरीद-फ़रोख्त भी. यह जीत सबसे ज़्यादा देश भर में  कस्बों और  गली-मोहल्लों में आबाद उन निम्नमध्यवर्ग और गरीब लोगों की है, अन्ना जिन  सबकी  आवाज़ बन गए, जिनके जुलूसों और नारों तक मीडिया की पहुंच नहीं थी  और  जिन्हें  इसकी  रत्ती  भर   परवाह  भी  नहीं  थी, जिन्हें  जाति-धर्म  के  नाम  पर  बरगलाया  न जा सका. शासकों को जनता ने मजबूर किया है कि सिर्फ़ विश्व-बैंक और अमेरिका के निर्देश में यहां कानून नहीं बनेंगे, बल्कि जनादेश से भी बन कर रहेंगे.
  
ये निश्चय ही जनता की जीत हॆ. आंदोलन जब सांसदों को घेरने तक पहुंचा ऒर जेल भरो की तैय्यारी हो गई तो सारी ही पार्टियों को यह समझ में आया कि उनकी समवेत हार हो सकती है. इस आंदोलन का फ़ायदा न भाजपा उठा सकती थी, न कांग्रेस. कांग्रेस-भाजपा नूरा-कुश्ती तक नहीं कर पाए संसद में, जैसा कि वे न्यूक्लियर डील के सवाल पर कर ले गए थे. आगे हर किसी के सामने अनिश्चय की दीवार खडी थी, खुद आंदोलन के नेताओं के सामने भी. अभी भी संसदीय समिति के सामने संसद की भावना रखी जाने के बाद वह क्या करेगी, कहा नहीं जा सकता. ये बडॆ घाघ लोग हॆं. फ़िर भी धमकी, चरित्र-हनन, दमन, छल-छंद, आंदोलन को तोडने का हर संभव प्रयास कर लेने के बाद ये हार गए. अन्ना भी कह रहे हैं कि लडाई में अभी पूरी जीत नहीं हुई है. यही सही बात है. आंदोलन का एक चरण पूरा हुआ.


आन्दोलन के कुछ दृश्य  


1. 22 अगस्त, मानस विहार कालोनी, लखनऊ

हर दिन इस नई बस रही कलोनी में काम पर आए मज़दूरों के यहां से अन्ना के समर्थन में जुलूस निकलता है. सर पर गांधी टोपी पहने 5 साल का एक नन्हा हज़ारे अपनी मां से ज़िद कर रहा है, मैं जुलूस के साथ जाऊंगा. 

2. 24 अगस्त, भावनगर, गुजरात

भावनगर के स्कूल कालेजों के 700 छात्र आइसा- इंकलाबी नौजवान सभा के आह्वान पर भ्र्ष्टाचार- विरोधी मार्च निकालते हैं. बडी तादाद में लडकियां भी हैं. लाठी चार्ज ही नहीं, पुलिस बदसलूकी भी करती है. गिरफ़्तार किए गए चार छात्र नेता (दो लडके और दो लडकियां) जमानत लेने की जगह जेल जाना पसंद करते हैं. वे जेल से ही अपना वक्तव्य जारी करते हैं- "जब मोदी फ़र्ज़ी एनकाउन्टर और साम्प्रदायिक हिंसा में अपनी सरकार की भूमिका पर पर्दा डालने के लिए ईमानदार पुलिस अधिकारियों को दण्डित करता है, तो क्या यह भ्रष्टाचार नहीं?". अगले दिन पूरे शहर के छात्र- छात्राएं थाना घेर लेते हैं. थानेदार माफ़ी मांगता है, छात्र बिना शर्त रिहा किए जाते हैं. मोदी द्वारा अन्ना के समर्थन का स्वांग तार-तार हो जाता है. 

3. 24 अगस्त, द्वारका, सेक्टर-10, नई दिल्ली

एक अध्यापिका 17-18 साल के एक रिक्शाचालक के रिक्शे पर सवार होती हैं. बातचीत चल पडती है. रिक्शाचालक हरदोई का नौजवान है. कानपुर में स्कूल में पढ रहा था कि पिता की मौत  हो गई. नाम है मुख्तार सिंह. (नाम से कहा नहीं जा सकता कि जाति क्या है) . मरते वक्त पिता ने पढाई जारी रखने के लिए कहा था. चाचा ने पैसे  देने से मना कर दिया. अब वह दिल्ली में रिक्शा खींचता है. मुख्तार सिंह इंटर के बाद बी. एड. करके स्कूल टीचर बनना चाहता है क्योंकि उसके मुताबिक यह पेशा सबसे अच्छा है जिसमें ज्ञान लिया ऒर दिया जाता है. अब मुख्तार ने प्राइवेट में दाखिला लिया है. अध्यापिका पूछती है, "तुम दिन भर रिक्शा खींचते हो, तो पढते कब हो?" मुख्तार कहता है, " मैडम, हर दिन शाम घर पहुंच कर मैं रोता हूं . लेकिन सोचता हूं कि अकेले मॆं ही तो कष्ट नहीं उठा रहा हूं. अब देखिए, अन्ना हज़ारे को, इस उम्र में भी कितना लड रहे हैं." अध्यापिका का अगला सवाल है, "क्या रामलीला मॆदान गए थे?" "नहीं. हमें तो रोज़ कमाना है, रोज़ खाना है. चाह कर भी जा नही जा सके," मुख्तार ने कहा.     

4. 25 अगस्त, सलोरी, इलाहाबाद

यह इलाहाबाद का वह इलाका हॆ जहां सबसे ज़्यादा छात्र रहते है. छोटे-छोटे कमरों में 2-2, 3-3 और कभी कभी 4-4 छात्र. यहां रहना अपेक्षाकृत सस्ता है. ज़्यादातर छात्र अपना खाना खुद बनाते हॆं ,उन्हीं छोटे कमरों में. कई तो अपना राशन भी गांव से ही लाते है. समझा जा सकता है कि ये किस तबके के छात्र हैं. जिस दिन अन्ना गिरफ़्तार हुए, इसी इलाके से लगभग 01 हजार का जुलूस निकला. यह इस आन्दोलन का इलाहाबाद में आयोजित पहला जुलूस था. यों तो इलाहाबाद बहुत बडा शहर नहीं है, लेकिन सिविल लाइंस, हाई-कोर्ट में फ़ंसी मीडिया की आंखें सलोरी तक नहीं पहुंच पाईं, तब भी नहीं जब यह जुलूस पांच किलोमीटर चलकर विश्वविद्यालय परिसर में 1942 के शहीद लाल पद्मधर की मूर्ति तक पहुंच गया. 

यही आज भी होना तय था. मुझे भी सम्बोधित करना था. रामायन राम, सुनील मौर्य आदि छात्र नेता दिनभर से इलाके में थे. वरिष्ठ छात्र राजेंद्र यादव सभा का संचालन कर रहे थे ऒर बता रहे थे कि माध्यमिक शिक्षा परिषद, उच्चतर शिक्षा आयोग आदि में अध्यापक के पदों पर सामान्य, ओ.बी.सी. ऒर अनु. जाति/जनजाति के अभ्यर्थियों के लिए अलग-अलग घूस के रेट्स क्या-क्या हैं. ये हर छात्र को यों भी मालूम है, जनरल नालेज की तरह. जे.एन.यू. छात्रसंघ के निवर्तमान अध्यक्ष संदीप सिंह ने भ्रष्टाचार और नई आर्थिक नीतियों के  अंतर्संबंध पर सारगर्भित भाषण दिया. मेरे बोलने के बाद 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का एक गगनभेदी नारा किसी ने उठाया और आंधी-तूफ़ान की तरह लगभग एक हज़ार की संख्या में नौजवान  बढ चले परिसर की ओर, लाल पद्मधर के शहादत स्थल की ओर.   

ऎसे हज़ारहां दष्य इस आन्दोलन के हैं, होंगे. हमें अपनी ओर से इनकी व्याख्या नहीं करनी. मत भूलिए कि चाहे कारपोरेट लूट हो या मंत्रियों, अफ़सरों द्वारा सरकारी खज़ानों में जमा जनता की गाढी कमाई की लूट हो, यह पूंजी का आदिम संचय है. भ्रष्टाचार के स्रोतों पर रोक लगाना पूंजी के आदिम संचय पर चोट करना है. इसी से इस पूंजीवादी लोकतंत्र के साझीदार सभी अपनी अपनी जाति-धर्म की जनता को इस आंदोलन से विरत करने में जुट चले. अगडा-पिछडा-दलित- अल्पसंख्यक की शासक जमातों के नुमाइंदे संसद में एक साथ थे. उनकी वर्गीय एकजुटता देखने लायक थी. दूसरी ओर इन सभी तबकों के निम्नमध्यवर्गीय ऒर गरीब लोग लगातार आंदोलन से आकर्षित हो रहे थे. लम्बे समय बाद जातिगत ऒर धर्मगत सामुदायिक चेतना में वर्गीय आधार पर दरारें दिखाई पडीं. अनेक दलों की गति सांप- छछूंदर की हुई. कभी समर्थन, कभी विरोध का नाटक चलता रहा. उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि वे अपने जनाधार को इस आंदोलन में जाने से रोकने की ताकत रखते हैं या नहीं. हर दिन  कैलकुलेशन बदल रहे थे. जब उन्हें लगा कि वे उन्हें नहीं रोक पा रहे तो समर्थन का नाटक करते और जैसे ही थोडा आत्मविश्वास आता कि रोक सकते हैं, तो पलटी मार जाते. लेकिन जहां चुनाव महज गणित से जीते जा सकते हैं, वहीं आंदोलन जिस तरह का रसायन तैयार  करते हैं, उनमें गणित करनेवालों को अक्सर ही हतप्रभ रह जाना पडता है. एक उदाहरण देखें. मनरेगा, बी. पी. एल. कार्ड और गरीबों के लिए दूसरी तमाम योजनाओं में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में गरीब लोग उतरेंगे ही, चाहे वे दलित हों, अति पिछडे हों, अल्पसंख्यक हों या अन्य. कोई मायावती, कोई लालू इसे नहीं रोक सकते, भले ही इस तबके का वोट वे विकल्प के अभाव में पा जाते हों या आगे भी पाते रहें.   

प्रतीकों  की  राजनीति  में  भी इस  आंदोलन  को  फ़ंसाने  की कई  कोशिशें  हुईं. झण्डे, बैनर, नारों के विद्वतापूर्ण  विश्लेषणों से  निष्कर्ष निकाले गए. अब  आंदोलन  के नेताओं को  भी इस आंदोलन की कमज़ोरियों, सीमाओं  और  ताकत का विश्लेषण  करना होगा ऒर ऎसी  राजनीतिक तकतों को भी जो देश में आमूल बदलाव चाहती हैं. उम्मीद यह भी जगी है कि रोज़गार का मौलिक अधिकार, महिला आरक्षण बिल, चुने  हुए  प्रतिनिधियों  को  वापस  बुलाने  का  अधिकार, नकारात्मक वोट देने का अधिकार, खास सेक्टरों के राष्ट्रीयकरण के कानून बनवाने तथा सेज़, न्यूक्लियर-डील, ए.एफ़.एस. पी.ए. जैसे दमनकारी कानूनों को रद्द कराने के बडे आंदोलन यह देश आगामी समय में देखेगा.

8/24/11

अन्ना, अरुंधति और देश- प्रणय कृष्ण- 2

(पेश है, अन्ना हजारे की अगुवाई में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन पर हालिया बहसों को समेटती, जसम महासचिव प्रणय कृष्ण की लेखमाला की दूसरी किस्त)

 अन्ना, अरुंधति और देश- प्रणय कृष्ण 

आज अन्ना के अनशन का आठवाँ दिन है. उनकी तबियत बिगड़ी है. प्रधानमंत्री का ख़त अन्ना को पहुंचा है. अब वे जन लोकपाल को संसदीय समिति के सामने रखने को तैयार हैं. प्रणव मुखर्जी से अन्ना की टीम की वार्ता चल रही है. सोनिया-राहुल आदि के हस्तक्षेप का एक स्वांग घट रहा है जिसमें कांग्रेस, चिदंबरम, सिब्बल  आदि से भिन्न आवाज में बोलते हुए गांधी परिवार के बहाने संकट से उबरने की कोशिश कर रही है. आखिर उसे भी चिंता है क़ि जिस जन लोकपाल के प्रावधानों के खिलाफ कांग्रेस और भाजपा दोनों का रवैया एक है, उस पर चले जनांदोलन का फायदा कहीं भाजपा को न मिल जाय. ऐसे में कांग्रेस ने सोनिया-राहुल को इस तरह सामने रखा है मानो वे नैतिकता के उच्च आसन से इसका समाधान कर देंगे और सारी गड़बड़ मानो सोनिया की अनुपस्थिति के कारण हुई. इस कांग्रेसी रणनीति से संभव है क़ि कोई समझौता हो जाए और कांग्रेस, भाजपा को पटखनी दे फिर से अपनी साख बचाने में कामयाब हो जाय. फिर भी अभी यह स्पष्ट नहीं है क़ि संसदीय समिति अंतिम रूप से किस किस्म के प्रारूप को हरी झंडी देगी, कब यह बिल सदन में पारित कराने के लिए पेश होगा और अंततः जो पारित होगा, वह क्या होगा? कुल मिलाकर इस आन्दोलन का परिणाम अभी भी अनिर्णीत है. यदि जन लोकपाल बिल अपने मूल रूप में पारित होता है तो यह आन्दोलन की विजय है अन्यथा अनेक  बड़े आंदोलनों की तरह इसका भी अंत समझौते या दमन में हो जाना असंभव नहीं है. आन्दोलन का हस्र जो भी हो, उसने जनता की ताकत, बड़े राष्ट्रीय सवालों पर जन उभार की संभावना और जरूरत तथा आगे के दिनों में भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के खिलाफ विराट आन्दोलनों की उम्मीदों को जगा दिया है.

रालेगांव सिद्धि से पिछले अनशन तक एक दूसरे अन्ना का आविष्कार हो चुका था और पहले अनशन से दूसरे के बीच एक अलग ही अन्ना सामने हैं. ये जन आकांक्षाओं की लहरों और आवर्तों से पैदा हुए अन्ना हैं. ये वही अन्ना नहीं हैं. वे अब चाहकर भी पुराने अन्ना नहीं बन सकते. जन कार्यवाहियों के काल प्रवाह से छूटे  हुए कुछ बुद्धिजीवी अन्ना और इस आन्दोलन को अतीत की  छवियों में देखना चाहते हैं. अन्ना गांधी सचमुच नहीं हैं. गांधी एक संपन्न, विदेश-पलट  बैरिस्टर से शुरू कर लोक की स्वाधीनता की आकांक्षाओं के जरिये महात्मा के नए अवतार में ढाल दिए गए. हर जगह की लोक चेतना ने उन्हें अपनी छवि में बार बार गढ़ा- महात्मा से चेथरिया पीर तक. अन्ना सेना में ड्राइवर थे. उन्हें अपने वर्ग अनुभव के साथ गांधी के विचार मिले. इन विचारों की जो अच्छाईयां-बुराईयाँ थीं, वे उनके साथ रहीं. अन्ना जयप्रकाश भी नहीं हैं. जयप्रकाश गरीब घर में जरूर पैदा हुए थे लेकिन उन्होंने अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त की थी. ये अन्ना को नसीब नहीं हुई. रामलीला मैदान में अन्ना ने यह चिंता व्यक्त की क़ि किसान और मजदूर अभी इस आन्दोलन में नहीं आये हैं. उनका आह्वान करते हुए उन्होंने कहा- "आप के आये बगैर यह लड़ाई अधूरी है." जेपी आन्दोलन में ये शक्तियां सचमुच पूरी तरह नहीं आ सकी थीं. बाबा नागार्जुन ने 1978 में लिखा था-

जय हो लोकनायक: भीड़-भाड़ ने पुकारा
जीत हुई पटना में, दिल्ली में हारा
क्या करता आखिर, बूढा बेचारा
तरुणों ने साथ दिया, सयानों ने मारा
जय हो लोकनायक: भीड़-भाड़ ने पुकारा

लिया नहीं संग्रामी श्रमिकों का सहारा
किसानों ने यह सब संशय में निहारा
छू न सकी उनको प्रवचन की धारा
सेठों ने थमाया हमदर्दी का दुधारा
क्या करता आखिर बूढा बेचारा

कूएं से निकल आया बाघ हत्यारा
फंस गया उलटे हमदर्द बंजारा
उतरा नहीं बाघिन के गुस्से का पारा 
दे न पाया हिंसा का उत्तर करारा 
क्या करता आखिर बूढा बेचारा

जय हो लोकनायक: भीड़-भाड़ ने पुकारा 
मध्यवर्गीय तरुणों ने निष्ठा से निहारा 
शिखरमुखी दल नायक पा गए सहारा 
बाघिन के मांद में जा फंसा बिचारा 
गुफा में बंद है शराफत का मारा

अन्ना ने यह कविता शायद ही पढी हो लेकिन इस आन्दोलन में किसान-मजदूरों के आये बगैर अधूरे रह जाने की उनकी बात यह बताती है क़ि उन्हें खुद भी जनांदोलनों के पिछले इतिहास और खुद उनके द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन की कमियों-कमजोरियों का एहसास है. अन्ना सचमुच यदि गांधी और जेपी (उनकी महानता के बावजूद) की नियति को ही प्राप्त होंगे तो यह कोई अच्छी बात न होगी.

सरकार ने महाराष्ट्र के टाप ब्यूरोक्रेट सारंगी और इंदौर के धर्मगुरु भैय्यू जी महराज को अन्ना के पास इसलिए भेजा था क़ि अन्ना को उनके थिंक टैंक से अलग कर दिया जाये. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शिंदे भी बिचौलिया बनने के लिए तैयार बैठे थे. ये लोग उस अन्ना की खोज में निकले थे जो राजनीतिक रूप से अपरिपक्व थे, जो कुछ का कुछ बोल जाया करते थे, और गुमराह भी किये जा सकते थे. शायद भैय्यू जी आदि को वह अन्ना प्राप्त नहीं हुए, जो अपनी सरलता में गुमराह होकर अपने प्रमुख सहयोगियों का साथ छोड़ कोई मनमाना फैसला कर डालें. लोकपाल बिल के लिए बनी संसदीय समिति में लालू जी जैसे लोग भी हैं. अब यह संसदीय समिति डाईलाग के दरवाजे खोले खड़ी है. कांग्रेस सांसद प्रवीण ऐरम ने उसके विचारार्थ जन लोकपाल का मसौदा भेज दिया था. भाजपा के वरुण गांधी जन लोकपाल का प्राईवेट मेंबर बिल लाने को उद्धत थे. कुल मिलाकर कांग्रेस-भाजपा दोनों बड़ी पार्टियां जो जन लोकपाल के खिलाफ हैं, जनता के तेवर भांप अपने एक-एक सांसद के माध्यम से यह सन्देश देकर लोगों में भ्रम पैदा करना चाहती थीं क़ि वे जनता के साथ हैं. एक तरफ सारंगी, भैय्यू जी, शिंदे, ऐरन और वरुण गांधी आदि द्वारा आन्दोलन को तोड़ने या फिर अपने पक्ष में इस्तेमाल करने के प्रयास था, तो दूसरी ओर  तमाम भ्रष्टाचारी दल और नेताओं द्वारा आन्दोलन में घुसपैठ तथा आन्दोलन में जा रहे अपने जनाधार को मनाने-फुसलाने-बहकाने की कोशिशें तेज थीं. मुलायम और मायावती द्वारा अन्ना का समर्थन न केवल इस प्रवृत्ति को दिखलाता है बल्कि इस भय को भी क़ि जनाक्रोश भ्रष्टाचार के खिलाफ जनाक्रोश महज यू पी ए के खिलाफ जाकर नहीं रुक जाएगा. उसकी आंच से ये लोग भी झुलस सकते हैं.

अरुणा राय, जो कांग्रेस आलाकमान की नजदीकी हैं, एक और लोकपाल बिल लेकर आयी हैं. उनका कहना है क़ि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में इस शर्त पर लाया जाय क़ि उस पर कार्यवाही के लिए सुप्रीम कोर्ट की रजामंदी जरूरी हो. शुरू से ही कांग्रेस का यह प्रयास रहा है क़ि जन लोकपाल के विरुद्ध वह न्यायपालिका को अपने पक्ष में खींच लाये, क्योंकि जन लोकपाल में न्यायपालिका के भ्रष्टाचार को भी लोकपाल के अधीन माना गया है. बहरहाल, संसद न्यायपालिका को लोकपाल से बचा ले और न्यायपालिका संसद और प्रधानमंत्री को लोकपाल से बचा ले, इस लेन-देन का पूर्वाभ्यास लम्बे समय से चल रहा है. 'ज्युडीशियल स्टैंडर्ट्स एंड एकाउंटेबिलिटी  बिल' जिसे पारित किया जाना है, उसके बहाने अरुणा राय लोकपाल के दायरे से न्यायपालिका को अलग रखने का प्रस्ताव करते हुए प्रधानमंत्री के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सहमति का एक लेन-देन भरा पैकेज तैयार कर लाई हैं. ज्युडीशियल कमीशन के सवाल पर संसदीय वाम दलों सहित वे नौ पार्टियां भी सहमत हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने का समर्थन किया है. भाजपा इस मुद्दे पर अभी भी चुप है. अब तक वह प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने के विरुद्ध कांग्रेस जैसी ही पोजीशन लेती रही है. शायद उसे अभी भी यह लोभ है क़ि अगला प्रधानमंत्री उसका होगा. वह न्यायपालिका को भी लोकपाल के दायरे में लाने के सवाल पर अपने पिछले नकारात्मक रवैय्ये पर किसी पुनर्विचार का संकेत नहीं दे रही.  इसीलिये अन्ना के सहयोगियों ने भाजपा से अपना रुख स्पष्ट करने की मांग की है.

अरुणा राय ने जन लोकपाल के दायरे से भ्रष्टाचार के निचले और जमीनी मुद्दों को अलग कर सेन्ट्रल विजिलेंस कमीशन के अधीन लाये जाने का प्रस्ताव किया है. सवाल यह है क़ि क्या सीवीसी के चयन की प्रक्रिया और भ्रष्टाचारियों को दण्डित करने का उसका अधिकार कानूनी संशोधन के जरिये वैसा ही प्रभावी बनाया जाएगा, जैसा क़ि जन लोकपाल बिल में है? अरुणा राय ने जन लोकपाल बिल को संसद और न्यायपालिका से ऊपर एक सुपर पुलिसमैन की भूमिका निभाने वाली संस्था के रूप में उसके संविधान विरोधी होने की निंदा की है. उनके अनुसार जन लोकपाल के लिए खुद एक विराट मशीनरी की जरूरत होगी और इतनी विराट मशीनरी को चलाने वाले जो बहुत सारे लोग होंगें, वे सभी खुद भ्रष्टाचार से मुक्त होंगें, इसकी गारंटी नहीं की जा सकती. आश्चर्य है क़ि बहन अरुंधति राय ने भी लगभग ऐसे ही विचार व्यक्त किये हैं. उनके हाल के एक लेख में अन्ना के आन्दोलन के विरोध में अब तक जो कुछ भी कहा जा रहा था, उस सबको एक साथ उपस्थित किया गया है.

अरुंधति राय का कहना है क़ि मूल बात सामाजिक ढाँचे की है और उसमें निहित आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक विषमताओं की. बात सही है लेकिन तमाम कानूनी संशोधनों के जरिये जनता को अधिकार दिलाने की लड़ाई इस लक्ष्य की पूरक है, उसके खिलाफ नहीं. अरुंधति ने इस आन्दोलन के कुछ कर्ता-धर्ताओं पर भी टिप्पणी की है. उनका कहना है क़ि केजरीवाल आदि एनजीओ चलाने वाले लोग जो करोड़ों की विदेशी सहायती प्राप्त करते हैं, उन्होंने लोकपाल के दायरे से एनजीओ को बचाने के लिए और सारा दोष सरकार पर मढने के लिए जन लोकपाल का जंजाल तैयार किया है. अब सांसत यह है क़ि जो लाखों की संख्या में देश के तमाम हिस्सों में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, क्या वे सब केजरीवाल और एनजीओ को बचाने के लिए उतर पड़े हैं? रही एनजीओ की बात तो वर्ल्ड सोशल फोरम से लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों में ईराक युद्ध और नव उदारवाद आदि तमाम मसलों पर सिविल सोसाईटी के जो भी आन्दोलन हाल के वर्षों में चले हैं, उनमें एनजीओ की विराट शिरकत रही है. क्या इन आन्दोलनों में बहन अरुंधति शामिल नहीं हुईं? क्या इनमें शरीक होने से उन्होंने इसलिए इनकार कर दिया क़ि इनमें एनजीओ भी शरीक हैं? जाहिर है क़ि नहीं किया और मेरी अल्पबुद्धि के अनुसार उन्होंने ठीक किया. इसमें कोई संदेह नहीं क़ि एनजीओ स्वयं नव उदारवादी विश्व व्यवस्था से जन्मी संस्थाएं हैं. इनकी फंडिंग के स्रोत भी पूंजी के गढ़ों में मौजूद हैं. इनका उपयोग भी प्रायः आमूल-चूल बदलाव को रोकने में किया जाता है. इनकी फंडिंग की कड़ी जांच हो, यह भी जरूरी है. लेकिन किसी भी व्यापक जनांदोलन में इनके शरीक होने मात्र से हम सभी जो इनके आलोचक हैं, वे शरीक न हों तो यह आम जनता की ओर पीठ देना ही कहलायेगा. बहन अरुंधति का लेख पुरानी कांस्पिरेसी थियरी का नया संस्करण है. कुछ जरूरी बातें उन्होंने ऐसी अवश्य उठायी है, जो विचारणीय हैं. लेकिन देश भर में चल रहे तमाम जनांदोलनों को चाहे वह जैतापुर का हो, विस्थापन के खिलाफ हो, खनन माफिया और भू-अधिग्रहण के खिलाफ हो, पास्को जैसी मल्टीनेशनल के खिलाफ हो या इरोम शर्मिला का अनशन हो- इन सभी को अन्ना के आन्दोलन के बरक्स खड़ा कर यह कहना क़ि अन्ना का आन्दोलन मीडिया-कारपोरेट-एनजीओ गठजोड़ की करतूत है, और वास्तविक आन्दोलन नहीं है, जनांदोलनों की प्रकृति के बारे में एक कमजर्फ दृष्टिकोण को दिखलाता है. अन्ना के आन्दोलन में अच्छी खासी तादात में वे लोग भी शरीक हैं, जो इन सभी आन्दोलनों में शरीक रहे हैं. किसी व्यक्ति का नाम ही लेना हो (दलों को छोड़ दिया जाए तो) तो मेधा पाटेकर का नाम ही काफी है. मेधा अन्ना के भी आन्दोलन में हैं, और अरुंधति भी मेधा के आन्दोलन में शरीक रही हैं.

अरुंधति ने अन्ना हजारे के ग्राम स्वराज की धारणा की भी आलोचना की है और यह आरोप भी लगाया है क़ि अन्ना पचीस वर्षों से अपने गाँव रालेगांव-सिद्धि के ग्राम निकाय के प्रधान बने हुए हैं. वहां चुनाव नहीं होता, लिहाजा अन्ना स्वयं गांधी जी की विकेंद्रीकरण  की धारणा के विरुद्ध केन्द्रीकरण के प्रतीक हैं. अरुंधति की पद्धति विचार से व्यक्ति की आलोचना तक पहुंचने की है. अन्ना तानाशाह हैं और विकेंद्रीकरण के खिलाफ, ऐसा मुझे तो नहीं लगता, लेकिन ऐसी आलोचना का हक़ अरुंधति को अवश्य है. अरुंधति ने मीडिया द्वारा इस पूरे आन्दोलन को भारी कवरेज देने और तिहाड़ में अन्ना की तमाम सरकारी आवभगत को भी कांस्पिरेसी थियरी के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया है. यह सच है क़ि मीडिया तमाम जनांदोलनों की पूरी उपेक्षा करता है. जंतर-मंतर पर जब अन्ना अनशन कर रहे थे तब मेधा पाटेकर ने भी कहा था क़ि उनकी बड़ी-बड़ी रैलियों को मीडिया ने नजरअंदाज किया. हमें खुद भी अनुभव है क़ि दिल्ली में लाल झंडे की ताकतों की एक-एक लाख से ऊपर की रैलियों को मीडिया षड्यंत्रपूर्वक दबा गया. ऐसे में इस आन्दोलन को इतना कवरेज देने के पीछे मीडिया की मंशा पर शक तो जरूर किया जा सकता है, लेकिन इसका भी ठीकरा आन्दोलन के सर पर फोड़ देने का कोई औचित्य नहीं समझ में आता है. सच तो यह है क़ि मीडिया ने इस आन्दोलन में शरीक गरीबों, शहरी निम्न मध्यमवर्ग, दलित और अल्पसंख्यकों के चेहरे गायब कर दिए हैं. उसने इस आन्दोलन की मुखालफत करने वालों को काफी जगह बख्शी हुई है. तमाम अखबारों के सम्पादकीय संसद की सर्वोच्चता के तर्क से व्यवस्था के बचाव में अन्ना को उपदेश देते रहे हैं. इसलिए यह कहना क़ि मीडिया आंदोलन का समर्थन कर रहा है, भ्रांतिपूर्ण है. मीडिया कितना भी ताकतवर हो गया हो, अभी वह जनांदोलन चलाने के काबिल नहीं हुआ है. ज्यादा सही बात यह है क़ि जो आन्दोलन सरकार और विपक्ष दोनों को किसी हद तह झुका ले जाने में कामयाब हुआ है, उसकी अवहेलना कारपोरेट मीडिया के लिए भी संभव नहीं है. अन्यथा वह अपनी जो भी गलत-सही विश्वसनीयता है, वह खो देगा.

अरुंधति ने 'वन्दे मातरम्', 'भारत माता की जय', 'अन्ना इज इंडिया एंड इंडिया इज अन्ना' और 'जय हिंद' जैसे नारों को लक्ष्य कर आन्दोलन पर सवर्ण और आरक्षण विरोधी राष्ट्रवाद का आरोप जड़ा है. सचमुच अगर ऐसा ही होता तो मुलायम और मायावती को क्रमशः अपने पिछड़ा और दलित जनाधार को बचाने के लिए तथा भ्रष्टाचार विरोधी जनाक्रोश से बचने के लिए आन्दोलन का समर्थन न करना पड़ता. यह सच है क़ि इन दोनों ने आन्दोलन का समर्थन इस कारण भी किया है क़ि भले ही वे केंद्र में यू पी ए का समर्थन कर रहे हों, उत्तर प्रदेश में उन्हें एक दूसरे से ही नहीं, बल्कि कांग्रेस से भी लड़ना है. लिहाजा समर्थन के पीछे कांग्रेस विरोधी लहर का फ़ायदा उठाने का भी एक मकसद जरूर है. अब इसका क्या कीजिएगा क़ि जंतर मंतर पर अन्ना के पिछले अनशन के समय आरक्षण विरोधी यूथ फार इक्वालिटी के लोग भी दिखे और वाल्मीकि समाज, रिपब्लिकन पार्टी, नोनिया समाज आदि भी अपने-अपने बैनरों के साथ दिखे. इस आन्दोलन में सर्वाधिक दलित महाराष्ट्र से शामिल हैं. बड़ी-बड़ी गाड़ियों में बैठ कर आये बड़े-बड़े लोग भी दिखे और चाय का ढाबा चलाने वाले तथा ऑटो रिक्शा चालक भी.

प्रकारांतर से अरुंधति ने नारों के माध्यम से आन्दोलन  में संघ की भूमिका को भी देखा है. मुश्किल यह है क़ि इन नारों को लगाने वाले तबके ज्यादा वोकल हैं और मीडिया के लिए अधिक ग्राह्य. इनसे अलग नारों और लोगों की आन्दोलन में कोई कमी नहीं. आन्दोलन के गैर-दलीय चरित्र के चलते ही लाल झंडे की ताकतों को इसी सवाल पर अपनी अलग रैलियाँ, अपनी पहचान के साथ निकालनी पड़ रही हैं. संघ को छिप कर खेलना है क्योंकि भाजपा खुद जन लोकपाल के खिलाफ रही है और अब तक पुनर्विचार के संकेत नहीं दे रही है. ऐसे में कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश को भुनाने के लिए संघ आन्दोलन में घुसपैठ कर रहा है जबकि भाजपा जन लोकपाल पर कांग्रेस के ही स्टैंड पर खड़ी है. यानी संघ-भाजपा का उद्देश्य यह है क़ि वह जन लोकपाल पर कोई कमिटमेंट भी न दे लेकिन आन्दोलन का अपने फायदे में इस्तेमाल कर ले जाए. दूसरे शब्दों में 'चित हम जीते, पट तुम हारे'. संघ क्यों नहीं अपनी पहचान के साथ स्वतन्त्र रूप से इस सवाल पर रैलियाँ निकाल रहा है, जैसा क़ि लाल झंडे की ताकतें कर रही हैं? संघ को अपनी पहचान आन्दोलन के पीछे छिपानी इसलिए पड़ रही है क्योंकि वह अपने राजनैतिक विंग भाजपा को संकट में नहीं डाल सकता. लेकिन किसी राष्ट्रव्यापी, गैर-दलीय, विचार-बहुल आन्दोलन में संघ अगर घुसपैठ करता है तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है. ऐसा भला कोई भी राजनीति करने वाला क्यों नहीं करेगा! जिन्हें इस आन्दोलन के संघ द्वारा अपहरण की चिंता है, वे खुद क्यों किनारे बैठ कर तूफ़ान के गुजरने का इंतज़ार करते हुए 'तटस्थ बौद्धिक वस्तुपरक वैज्ञानिक विश्लेषण' में लगे हुए हैं? आपके वैज्ञानिक विश्लेषण से भविष्य की पीढियां लाभान्वित हो सकती हैं, लेकिन जनता की वर्तमान आकांक्षाओं की लहरों और आवर्तों पर इनका प्रभाव तभी पड़ सकता है, जब आप भी लहर में कूदें. तट पर बैठकर यानी तटस्थ रहकर सिर्फ उपदेश न दें. आन्दोलन की लहर को संघ की ओर न जाने देकर रेडिकल परिवर्तन की ओर ले जाने का रास्ता भी आन्दोलन के भीतर से ही जाता है. तटस्थ विश्लेषण बाद में भी हो सकते हैं. लेकिन यदि कोई यह माने ही बैठा हो क़ि आन्दोलन एक षड्यंत्र है जिसे संघ अथवा कांग्रेस, कारपोरेट घरानों, एनजीओ या मीडिया ने रचा है  तो फिर उसे समझाने का क्या उपाय है? ऐसे लोग किसी नजूमी की तरह आन्दोलन क्या, हरेक चीज का अतीत-वर्तमान-भविष्य जानते हैं. वे त्रिकालदर्शी हैं और आन्दोलन ख़त्म होने के बाद अपनी पीठ भी ठोंक सकते हैं क़ि 'देखो, हम जो कह रहे थे वही हुआ न!'.

अन्ना का यह आह्वान क़ि जनता अपने सांसदों को घेरे, बेहद रचनात्मक है. उत्तर प्रदेश में इस आन्दोलन की धार को कांग्रेस ही नहीं, बल्कि मुलायम और मायावती के भीषण भ्रष्टाचार की ओर मोड़ा जाना चाहिए. यही छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात में भाजपा के विरुद्ध किया जाना चाहिए. कांग्रेस शासित प्रदेश तो स्वभावतः इसके निशाने पर हैं. बिहार में इसे लालू और नितीश, दोनों के विरुद्ध निर्देशित किया जाना चाहिए. ग्रामीण गरीबों, शहरी गरीबों, छात्र-छात्राओं, संगठित मजदूरों और आदिवासियों के बीच सक्रिय संगठनों को अपने-अपने हिसाब से अपने-अपने सेक्टर में हो रहे भ्रष्टाचार पर स्वतन्त्र रूप से केन्द्रित करना चाहिए. बौद्धिकों को भविष्यवक्ता और नजूमी बनने से बाज आना चाहिए, अन्यथा वे अपनी विश्वसनीयता ही खोएंगे.

8/20/11

अन्ना और संसद- प्रणय कृष्ण



अन्ना और संसद 

(जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से उठी बहसों पर एक श्रृंखला लिख रहे हैं. प्रस्तुत है इस लेखमाला की पहली कड़ी)

“जिसे आप ”पार्लियामेंटों की माता” कहते हैं, वह पार्लियामेंट तो बांझ और बेसवा है. ये दोनों शब्द बहुत कडे हैं, तो भी उसे अच्छी तरह लागू होते हैं. मैंने उसे बांझ कहा, क्योंकि अब तक उस पार्लियामेंट ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया. अगर उस पर जोर-दबाव डालनेवाला कोई न हो, तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है और वह बेसवा है क्योंकि जो मंत्रिमंडल उसे रखे, उसके पास वह रहती है. आज उसका मालिक  एसिक्वथ है, तो कल वालफर होगा तो परसों कोई तीसरा."
"हिंद स्वराज" (1909) में गांधी

गांधी के उपरोक्त उद्धरण को यहां रखते हुए इसे न तो  मैं सार्वकालिक सत्य की तरह उद्धृत कर रहा हूं, न अपनी और से कुछ कहने के लिए, बल्कि इंगलैंड की तब की बुर्जुआ पार्लियामेंट के  बारे में गांधी के विचारों को ही आज के, बिलकुल अभी के  हालात को समझने के  लिए रख रहा हूं.

अभी भी प्रधानमंत्री इस बात पर डटे हुए हैं कि अन्ना का आन्दोलन संसद की अवमानना करता है और इसीलिए अलोकतांत्रिक है. दर- असल लोकरहित संसद महज तंत्र है और इस तंत्र को चलानेवाले (मंत्रिमंडल) के सदस्य तब से लोक को गाली दे रहे हैं, जब से अन्ना का पहला अनशन जंतर-मंतर पर शुरू  हुआ. लोकतंत्र और संविधान की चिंता में दुबले हो रहे कुछ अन्य दल जैसे कि राजद और  सपा ने भी अपने सांसदों रघुवंश प्रसाद और मोहन सिंह के ज़रिए तब यही रुख अख्तियार कर रखा था. संसद की  रक्षा में तब कुछ वाम नेताओं के लेख भी आए थे, जबकि संसद को जनांदोलन से ऊपर रखने को मार्क्सवादी शब्दावली में  "संसदीय बौनापन” कहा जाता है. यदि भाकपा (माले) जैसे वामदल और उससे जुडे संगठनों को छोड़ दें जिन्होंने जंतर-मंतर वाले अन्ना के अनशन के  साथ ही इस मुद्दे पर आन्दोलन का रुख अख्तियार कर लिया. तो अन्य वामदलों ने जिनकी संसद में अभी भी अच्छी संख्या है, "वेट एंड वाच” का रुख अपनाया. कर्नाटक और अन्यत्र तथा केंद्र में अपने पिछले कार्यकाल में भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों में फंसी भाजपा ने अन्ना के आन्दोलन के समानांतर रामदेव को खड़ाकर जनाक्रोश को अपने फायदे में भुनाने की भरपूर कोशिश की. संघ का नेटवर्क रामदेव के लिए लगा. लेकिन कांग्रेसियों ने खेले-खाए रामदेव को उन्हीं के जाल में फंसा दिया. योग के नाम पर सत्ताधारी दल से जमीन और तमाम दूसरे फायदे उठाने वाले रामदेव का हश्र होना भी यही था.

बहरहाल आज स्थिति बदली हुई है. लोकपाल बिल पर सिविल सोसाईटी से किये हर वादे से मुकरने के बाद सरकार ने पूरी मुहिम चलाई क़ि अन्ना हठधर्मी हैं, संविधान और संसद को नहीं मानते. टीआरपी केन्द्रित मीडिया भले ही इस उभार को परिलक्षित कर रहा हो लेकिन अगर बड़े अंगरेजी अखबारों के हाल-हाल तक के सम्पादकीय पढ़िए तो लगभग सभी ने कांग्रेसी लाइन का समर्थन किया. किसी ने पलटकर यह पूछना गवारा न किया क़ि क्या जनता का एकमात्र अधिकार वोट देना है? जनता के अंतर्विरोधों को साधकर तमाम करोडपति भ्रष्ट और कारपोरेट दलाल मनमोहन सिंह, चिदंबरम, सिब्बल, शौरी, प्रमोद महाजन, मोंटेक आदि विश्व बैंक और अमरीका निर्देशित विश्व व्यवस्था के हिमायती अगर संसद को छा लें तो जनता को क्या करना चाहिए?
क्या वोट पाने के बाद सांसदों को कुछ भी करने का अधिकार है? क्या संसद में उनके कारनामों पर जनता का कोई नियंत्रण होना चाहिए या नहीं? यदि होना चाहिए तो उसके तरीके क्या हों? क्यों न जनादेश की अवहेलना करने वालों को वापस बुलाने का अधिकार भी जनता के पास हो? यदि यह अधिकार कम्युनिस्ट शासन द्वारा वेनेजुएला की जनता के लिए लाये गए संवैधानिक सुधारों में शामिल है, तो भारत जैसे कथित रूप से 'दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र' में जनता को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्यों 'किसी को भी वोट न देने' या 'विरोध में वोट देने' का विकल्प मतपत्र में नहीं दिया जा सकता? लेकिन मीडिया बैरनों को ये सारे सवाल सत्ताधारियों से पूछना गवारा न था.

एक मोर्चा यह खोला गया क़ि जैसे जेपी आन्दोलन से संघ को फ़ायदा हुआ, वैसे ही अन्ना के आन्दोलन से भी होगा. अब मुश्किल यह है क़ि जिस बौद्धिक वर्ग में यह सब ग्राह्य हो सकता था, उसके पास नेहरू-गोविंदबल्लभ पन्त से लेकर राजीव गांधी तक कांग्रेस और संघ परिवार के बीच तमाम आपसी दुरभिसंधियों का डाक्युमेंटेड  इतिहास है. जेपी आन्दोलन से संघ को जो वैधता मिली हो, लेकिन आज़ादी के बाद संघ को समय-समय पर जितनी मजबूती प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कांग्रेस ने पहुंचाई है, उतनी किसी और ने नहीं. उसके पूरे इतिहास के खुलासे की न यहां जगह है और न जरूरत. बहरहाल शबनम हाशमी और अरुणा राय जैसे सिविल सोसाईटीबाज़, जिनका एक्टिविज्म कांग्रेसी सहायता के बगैर एक कदम भी नहीं चलता, "संघ के हव्वे" पर खेल गए. मुंहफट कांग्रेसियों ने अन्ना के आन्दोलन को संघ से लेकर माओवाद तक से जोड़ा, लेकिन उन्हें इतनी बड़ी जनता नहीं दिखी, जो इतनी सारी वैचारिक बातें नहीं जानती. वह एक बात जानती है क़ि सरकार पूरी तरह भ्रष्ट है और अन्ना पूरी तरह उससे मुक्त.

अभी कल तक कुछ चैनलों के संवाददाता अन्ना के समर्थन में आये सामान्य लोगों से पूछ रहे थे क़ि वे जन लोकपाल बिल और सरकारी बिल में क्या अंतर जानते हैं? बहुत से लोगों को नहीं पता था, लेकिन उन्हें इतना पता था क़ि अन्ना सही हैं और सरकार भ्रष्ट. जनता का जनरल नालेज टेस्ट कर रहे इन संवाददाताओं के जनरल नालेज की हालत यह थी क़ि वे यहां तक कह रहे थे क़ि आन्दोलन अभी तक मेट्रो केन्द्रों तक ही सीमित है. उन्हें सिर्फ प्रादेशिक राजधानियों में ही अन्ना का समर्थन दिख रहा था. देवरिया, बलिया, आरा, गोरखपुर, ग्वालियर, बस्ती, सीवान, हजारीबाग, मदुरै, कटक, बर्दमान, गीरिडीह, सोनभद्र से लेकर लेह-लद्दाख और हज़ारों कस्बों और छोटे कस्बों में निम्न मध्यवर्ग के बहुलांश में इनको परिवर्तन की तड़प नहीं दिख रही.

जबसे नयी आर्थिक नीतियाँ शुरू हुईं, तबसे भारत की शासक पार्टियों ने विभाजनकारी, भावनात्मक और उन्मादी मुद्दों को सामने लाकर बुनियादी सवालों को दबा दिया. इस आन्दोलन में भी जाति और धर्मं के आधार पर लोगों को आन्दोलन से दूर रखने की कोशिशे तेज हैं. बहुतेरी जातियों के कथित नेता और बुद्धिजीवी चैनलों में बिठाये जा रहे हैं ताकि वे अपनी जाति और समुदाय को इस आन्दोलन से अलग कर सकें .राशिद अल्वी का बयान खास तौर पर बेहूदा है क्योंकि वह साम्राज्यवाद विरोधी ज़ज्बे को साम्प्रदायिक नज़र से समझता है. अल्वी, जो कभी बसपा में थे और ज़ातीतौर पर शायद उतने बुरे आदमी नहीं समझे जाते, उन्हें कांग्रेसियों ने यह समझाकर रणभूमि में भेजा कि अमेरिका से  अगर किसी तरह इस आन्दोलन का संबंध जोड़ दिया जाए तो मुसलमान तो जरूर ही भड़क जायेंगें. अमेरिका जो हर मुल्क की अंदरूनी हालत पर टिप्पणी करके अपने वर्चस्व और हितों की हिफाजत करता है, उसने अन्ना के आन्दोलन पर सकारात्मक टिप्पणी करके इसका आधार भी मुहैय्या करा दिया. जबकि अमेरिका से बेहतर कोई नही जानता कि यह आन्दोलन महज़ लोकतंत्र के किसी बाहरी आवरण तक सीमित नहीं, बल्कि इसमें एक साम्राज्यवाद विरोधी संभावना है.

आईडेंटिटी पालिटिक्स के दूसरे भी कई अलंबरदार इस आन्दोलन को ख़ास जाति समूहों का आन्दोलन बता रहे हैं. पहले अनशन के समय रघुवंश प्रसाद सिंह के करीबी कुछ पत्रकार इसे वाणी दे रहे थे. अभी कल हमारे मित्र चंद्रभान प्रसाद इसे सवर्ण आन्दोलन बता रहे थे एक चैनल पर. यह वही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने आज की बसपाई राजनीति की सोशल इंजीनियरिंग यानी ब्राह्मण-दलित गठजोड़ का सैद्धांतिक आधार प्रस्तुत करते हुए काफी पहले ही यह प्रतिपादित किया था कि पिछड़ा वर्ग आक्रामक है, लिहाजा रक्षात्मक हो रहे सवर्णों के साथ दलितों की एकता स्वाभाविक है. यह यही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने गुजरात जनसंहार में पिछड़ों को प्रमुख रूप से जिम्मेदार बताते हुए इन्हें हूणों का वंशज बताया था. अब सवर्णों के साथ दलित एकता के इस 'महान' प्रवर्तक को यह आन्दोलन कैसे नकारात्मक अर्थों में महज सवर्ण दिख रहा है?  वफ़ा सरकार और कांग्रेस के प्रति जरूर निभाएं चंद्रभान, लेकिन इस विडम्बना का क्या करेंगें कि मायावती ने अन्ना का समर्थन कर डाला है. अगर किसी दलित को भ्रमित भी होना होगा तो वह मायावती से भ्रमित होगा या चंद्रभान जी से ?

आज का मध्यवर्ग और खासकर निम्न मध्य वर्ग आज़ादी के पहले वाला महज सवर्ण मध्यवर्ग नहीं रह गया है. अगर यह आन्दोलन आशीष नंदी जैसे अत्तरवादियों की निगाह में महज मध्यवर्गीय है, तो इसमें पिछड़े और दलित समुदाय का मध्यवर्गीय हिस्सा भी अवश्य शामिल है. पिछले अनशन में मुझे इसीलिये रिपब्लिकन पार्टी, वाल्मीकि समाज आदि के बैनर और मंच जंतर-मंतर पर देख ज़रा भी अचरज नहीं हुआ था. अब जबकि लालू, मुलायम और मायावती भी अन्ना की गिरफ्तारी के बाद लोकतांत्रिक हो उठे हैं, तो इस आन्दोलन को तोड़ने के जातीय कार्ड की भी सीमाएं स्पष्ट हो गई हैं.

बे अंदाज़ कांग्रेसियों ने अन्ना को अपशब्द और भ्रष्ट तक कहा. हत्या का मंसूबा रखने वाले जब देख लेते हैं कि वे हत्या नहीं कर पा रहे, तो 'चरित्र हत्या' पर उतरते हैं. शैला मसूद की भाजपाई सरकार के अधीन हत्या की जा सकती थी, तो उनकी हत्या कर दी गई. अन्ना की हत्या नहीं की जा सकती थी, सो उनकी चरित्र हत्या की कोशिश की गई. अब राशिद अल्वी जैसे कांग्रेसियों को न्ना के आन्दोलन के पीछे अमेरिकी हाथ दिखाई दे रहा है. कभी इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस अपने हर विरोधी को 'सीआईए एजेंट' की पदवी से नवाज़ा करती थी. राशिद अल्वी भूल गए हैं कि अमेरिकी हाथ वाला नुस्खा पुराना है, और अब दुनिया ही नहीं बदल गई है, बल्कि उनकी पूरी सरकार ही देश में अमेरिकी हितों की सबसे बड़ी रखवाल है. तवलीन सिंह आदि दक्षिणपंथी इस चिंता में परेशान हैं कि अन्ना खुद और उनके सहयोगी क्यों भ्रष्टाचार को साम्राज्य्परस्त आर्थिक नीतियों से जोड़ रहे हैं?

गांधी ने हिंद स्वराज में लिखा था- "अगर पार्लियामेंट बाँझ न हो तो इस तरह होना चाहिए. लोग उसमें अच्छे से अच्छे मेंबर चुन कर भेजते हैं... ऐसी पार्लियामेंट को अर्जी की जरूरत नहीं होनी चाहिए, न दबाव की. उस पार्लियामेंट का काम इतना सरल होना चाहिए कि दिन ब दिन उसका तेज बढ़ता जाए और लोगों पर उसका असर होता जाए. लेकिन इसके उलटे इतना तो सब कबूल करते हैं कि पार्लियामेंट के मेंबर दिखावटी और स्वार्थी पाए जाते हैं. सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं. सिर्फ डर के कारण ही पार्लियामेंट कुछ काम करती है. जो काम आज किया उसे कल रद्द करना पड़ता है. आज तक एक ही चीज को पार्लियामेंट ने ठिकाने लगाया हो ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती. बड़े सवालों की चर्चा जब पार्लियामेंट में चलती है तब उसके मेंबर पैर फैला कर लेटते हैं, या बैठे बैठे झपकियाँ लेते हैं. उस पार के मेंबर इतने जोरों से चिल्लाते है कि सुनने वाले हैरान परेशान हो जाते हैं. उसके एक महान लेखक ने उसे 'दुनिया की बातूनी' जैसा नाम दिया है.... अगर कोई मेंबर इसमें अपवादस्वरूप निकल आये तो उसकी कमबख्ती ही समझिये. जितना समय और पैसा पार्लियामेंट खर्च करती है, उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाए. ब्रिटिश पार्लियामेंट महज प्रजा का खिलौना है और वह खिलौना प्रजा को भारी खर्च में डालता है. यह विचार मेरे खुद के हैं, ऐसा आप न माने.... एक मेंबर ने तो यहां तक कहा है कि पार्लियामेंट धर्मनिष्ठ आदमी के लायक नहीं रही..... आज सात सौ बरस के बाद भी पार्लियामेंट बच्चा ही हो तब वह बड़ी कब होगी." 


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